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इंदौर की लता बाई: परिवार की अनदेखी में समाजसेवियों ने निभाई जिम्मेदारी

इंदौर की लता बाई की कहानी एक दुखद उदाहरण है, जिसमें परिवार ने उनकी अनदेखी की और समाजसेवियों ने उनकी मदद की। लता बाई ने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी से एक फ्लैट खरीदा, लेकिन उनके बेटे ने उसे अपने नाम करवा लिया। घर से बाहर होने के बाद, प्रीयु फाउंडेशन ने उनकी सहायता की और उन्हें वृद्धाश्रम में रखा। उनकी मृत्यु के बाद, परिवार ने अंतिम संस्कार में भाग नहीं लिया, जबकि समाजसेवियों ने उनकी जिम्मेदारी निभाई। यह कहानी समाज में रिश्तों की वास्तविकता को उजागर करती है।
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लता बाई की दुखद कहानी


इंदौर के सिलिकॉन सिटी क्षेत्र में स्थित गणेश रेसिडेंसी से जुड़ी लता बाई की कहानी कई सवाल उठाती है। संस्था से जुड़े व्यक्तियों के अनुसार, लता बाई ने अपनी जीवनभर की बचत और गहने बेचकर एक फ्लैट खरीदा था। लेकिन बाद में उनके एक बेटे ने कथित तौर पर उस फ्लैट को अपने नाम करवा लिया और लता बाई को घर से बाहर निकाल दिया। इस मामले में उनके बेटों का कोई बयान नहीं आया है।


जीवन यापन की चुनौतियाँ

घर से बाहर होने के बाद लता बाई के सामने रहने और जीवन यापन की समस्याएँ उत्पन्न हो गईं। इसी बीच, उनकी स्थिति की जानकारी प्रीयु फाउंडेशन के अजय नागदा तक पहुँची। संस्था ने उनकी सहायता की और मेडिकल जांच के बाद उन्हें जानकी वृद्धाश्रम में आश्रय दिलाया।


आठ महीने का आश्रय

लता बाई लगभग आठ महीने तक वृद्धाश्रम में रहीं, जहाँ संस्था के सदस्य उनकी देखभाल करते रहे। लेकिन कुछ समय बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें इंदौर के एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उपचार शुरू किया, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।


बेटों की अनदेखी

संस्था के अनुसार, लता बाई के चार बेटे हैं। उनकी मृत्यु के बाद सभी बेटों को सूचित करने की कोशिश की गई। ओम शांति आश्रम की ब्रह्मकुमारी ज्योति दीदी के माध्यम से चारों बेटों को निधन की सूचना दी गई। हालांकि, सूचना मिलने के बावजूद कोई भी बेटा अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ। इसके अलावा, चारों बेटों ने मां को मुखाग्नि देने से भी इनकार किया।


समाजसेवियों की भूमिका

जब परिवार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली, तो प्रीयु फाउंडेशन और जानकी वृद्धाश्रम के सदस्यों ने लता बाई के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी ली। आवश्यक प्रक्रियाएँ पूरी करने के बाद उनकी पार्थिव देह को रीजनल पार्क ले जाया गया, जहाँ समाजसेवियों ने पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया। पिछले आठ महीनों से जिन लोगों ने लता बाई की देखभाल की थी, उन्होंने ही उनकी अंतिम यात्रा में भी उनका साथ दिया। यह मामला इस बात को लेकर चर्चा में है कि कठिन समय में लता बाई के साथ उनके परिवार के बजाय वे लोग खड़े रहे, जिनसे उनका कोई खून का रिश्ता नहीं था।