उच्चतम न्यायालय ने फांसी की सजा पर याचिका खारिज की
फांसी की सजा पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय
उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें फांसी की सजा के स्थान पर कम दर्दनाक विकल्प अपनाने की मांग की गई थी। यह याचिका लगभग नौ वर्ष पुरानी थी।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में वैज्ञानिक या चिकित्सीय साक्ष्य यह साबित करते हैं कि फांसी की संवैधानिक वैधता में बदलाव आया है, तो यह निर्णय पुनर्विचार के लिए बाधा नहीं बनेगा।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 1983 के 'दीना बनाम भारत संघ' मामले में तीन न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय को बड़ी पीठ के पास पुनर्विचार के लिए भेजने से मना कर दिया।
यह निर्णय तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में लिया गया था, जिसमें न्यायमूर्ति आरएस पाठक और न्यायमूर्ति सब्यसाची मुखर्जी शामिल थे।
पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि 'दीना' मामले के फैसले और सीआरपीसी की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार के लिए कोई ठोस आधार नहीं मिला।
न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने कहा कि याचिका के खारिज होने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में संवैधानिक समीक्षा का दरवाजा बंद हो गया है। यदि नए वैज्ञानिक प्रमाण सामने आते हैं, तो इस पर पुनर्विचार किया जा सकता है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि संविधान की व्याख्या एक जीवंत प्रक्रिया है और इसे वैज्ञानिक ज्ञान के विकास के साथ तालमेल बनाना चाहिए।
न्यायालय ने केंद्र सरकार को मृत्युदंड के मौजूदा तरीके की व्यापक वैज्ञानिक समीक्षा करने की अनुमति दी है।
न्यायालय ने सुझाव दिया कि यदि केंद्र सरकार उचित समझे, तो वह विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर सकती है, जो फांसी के वैकल्पिक तरीकों की जांच कर सके।
यह याचिका 2017 में अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर की गई थी, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 354(5) को चुनौती दी गई थी।
ऋषि मल्होत्रा ने तर्क किया था कि फांसी देना क्रूर है और यह अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार के खिलाफ है।
मार्च 2023 में हुई एक सुनवाई के दौरान, उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से फांसी के प्रभाव और वैकल्पिक तरीकों पर वैज्ञानिक डेटा मांगा था।
