चंडीगढ़ में अजन्मे बच्चे के अधिकारों की ऐतिहासिक जीत
अजन्मे बच्चे के अधिकारों की कानूनी मान्यता
चंडीगढ़: एक मां ने अपने अजन्मे बच्चे के अधिकारों के लिए चार साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। अंततः, जिला अदालत ने उस बच्चे को कानूनी मान्यता दी और परिवार को 1.80 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
दुर्घटना और उसके बाद की घटनाएँ
यह घटना 8 जून 2022 को हुई। जीरकपुर की निवासी नेहा गर्ग अपने पति अमूल्य गुप्ता, सास और ससुर के साथ मोगा जा रही थीं, तभी खन्ना के पास जीटी रोड पर एक तेज रफ्तार कार ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी। इस हादसे में पूरा परिवार घायल हुआ, और नेहा की स्थिति सबसे गंभीर थी, जिससे उनके एक हाथ में 40 प्रतिशत दिव्यांगता आ गई।
कानूनी लड़ाई का संघर्ष
इस दुर्घटना के समय नेहा लगभग साढ़े छह सप्ताह की गर्भवती थीं। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने बताया कि दवाओं और चोटों के कारण गर्भ में पल रहे बच्चे को खतरा है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि डॉक्टरों की सलाह पर गर्भपात कराना पड़ा, जिससे परिवार ने अपनी आने वाली संतान को हमेशा के लिए खो दिया।
नेहा और उनके पति ने हार नहीं मानी और अजन्मे बच्चे के अधिकारों के लिए चंडीगढ़ जिला अदालत में मामला दायर किया। चार साल की इस कानूनी लड़ाई में उन्होंने साबित किया कि गर्भ में पल रहा बच्चा भी कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है। अदालत ने उनकी बात सुनी और उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसमें अजन्मे बच्चे को कानूनी मान्यता देते हुए परिवार को 1 लाख 80 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
नेहा गर्ग ने अपनी चोटों और मानसिक पीड़ा के बावजूद न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनका संघर्ष केवल पैसे के लिए नहीं था, बल्कि अपने खोए हुए बच्चे को कानूनी पहचान दिलाने के लिए था। अदालत के इस फैसले ने यह स्पष्ट किया कि कानून अजन्मे बच्चे के अधिकारों को भी मान्यता दे सकता है।
