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डिजिटल इंडिया: बुजुर्गों के लिए एक नई चुनौती

भारत में डिजिटल इंडिया अभियान ने बुजुर्गों के लिए कई नई चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं। हेल्पएज इंडिया के सर्वे के अनुसार, 85.8% बुजुर्ग डिजिटल रूप से निरक्षर हैं। केवल 5% लोग ऑनलाइन सेवाओं का उपयोग करते हैं। इस लेख में, हम जानेंगे कि कैसे यह अभियान वरिष्ठ नागरिकों के लिए समस्याएँ पैदा कर रहा है और सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए। क्या डिजिटल इंडिया वास्तव में सभी के लिए फायदेमंद है? जानने के लिए पढ़ें।
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बुजुर्गों की डिजिटल निरक्षरता


भारत में लगभग 15 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हैं, और यह संख्या 2050 तक दोगुनी होने की संभावना है। हेल्पएज इंडिया द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 85.8% बुजुर्ग डिजिटल रूप से निरक्षर हैं। केवल 5% लोग ऑनलाइन बैंकिंग या स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करते हैं। 66% बुजुर्ग इन सेवाओं को भ्रमित करने वाला मानते हैं, और 51% गलती करने के डर से इनसे दूर रहते हैं।


डिजिटल इंडिया का असली चेहरा

डिजिटल इंडिया अभियान की शुरुआत में सरकार ने वादा किया था कि तकनीक हर नागरिक के जीवन को सरल बनाएगी। आधार, यूपीआई, ई-गवर्नेंस पोर्टल, ऑनलाइन टैक्स फाइलिंग और शिकायत निवारण प्रणालियों का उद्देश्य आम लोगों को बिचौलियों से मुक्त करना था। लेकिन 2026 में, यह अभियान कई बुजुर्गों और ग्रामीणों के लिए नई समस्याएं उत्पन्न कर रहा है।


बुजुर्गों को लैंड टैक्स, एलपीजी, आधार, लाइसेंस, पासपोर्ट, बैंकिंग और जीवन प्रमाण के लिए विभिन्न वेबसाइटों और बायोमेट्रिक स्कैनर का सामना करना पड़ता है। कई बार, उंगलियों की रगड़ या आर्थराइटिस के कारण स्कैनर काम नहीं करते। पासवर्ड भूलना, छोटे फॉन्ट पढ़ना, और ओटीपी प्राप्त करना रोजमर्रा की चुनौतियाँ बन गई हैं।


एक वरिष्ठ दंपत्ति की कहानी

दिल्ली में रहने वाले एक वरिष्ठ दंपत्ति को अपने शेयर सर्टिफिकेट के लिए कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के पोर्टल पर आवेदन करना अनिवार्य बताया गया। हालांकि, जब भी उन्होंने आवेदन किया, उनका आवेदन किसी न किसी कारण से अस्वीकार हो गया। अंततः उन्हें मंत्रालय में जाकर अपनी समस्या का समाधान करना पड़ा।


लगभग एक साल की मेहनत के बाद, उनके शेयर सर्टिफिकेट डिजिटल रूप में परिवर्तित हुए और उन्हें डिविडेंड भी मिला। यह स्थिति दर्शाती है कि 'डिजिटल इंडिया' की वास्तविकता सरकारी दावों से बहुत दूर है।


डिजिटल डिवाइड की समस्या

दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 'डिजिटल डिवाइड' पर टिप्पणी की है, यह बताते हुए कि ऑनलाइन मोड गरीबों, वरिष्ठों और दिव्यांगों के लिए बाधा बन रहा है। कई बुजुर्ग परिवार के सदस्यों या साइबर कैफे पर निर्भर रहते हैं, जिससे अतिरिक्त खर्च होता है।


ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुंच केवल 34-41% है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 70% से अधिक है। कनेक्टिविटी की कमी, बिजली की अनियमितता और महंगे उपकरण बड़ी बाधाएं हैं।


सरकार की जिम्मेदारी

सरकार का दावा है कि ऑनलाइन शिकायत पोर्टल प्रक्रियाओं को सरल बनाते हैं, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। अधिकांश पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड करने की फाइल साइज लिमिट होती है।


डिजिटलीकरण ने साइबर अपराध को भी बढ़ावा दिया है, जिससे बुजुर्ग ठगी का शिकार हो रहे हैं। सरकार को इस समस्या के समाधान के लिए कदम उठाने चाहिए।


हर ब्लॉक में बुजुर्गों और ग्रामीणों के लिए मुफ्त हेल्प डेस्क की स्थापना की जानी चाहिए, जहां प्रशिक्षित स्टाफ फॉर्म भरने में मदद कर सके।