दिल्ली अदालत का ऐतिहासिक फैसला: पिता को बच्चों के भरण-पोषण के लिए देना होगा मासिक सहायता
न्यायपालिका का सख्त रुख
पारिवारिक विवादों और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में, भारत की न्यायपालिका ने एक बार फिर से एक सख्त और स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाया है। दिल्ली की एक सत्र अदालत ने एक महिला की अपील पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि कोई भी सक्षम पुरुष नौकरी न होने का बहाना बनाकर अपने परिवार को असहाय नहीं छोड़ सकता। अदालत ने मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए आरोपी पिता को अपने नाबालिग बेटे के उचित पालन-पोषण के लिए हर महीने एक निश्चित राशि देने का निर्देश दिया है।
महिला की अपील और अदालत का निर्णय
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब एक पीड़ित महिला ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उसे घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत किसी भी वित्तीय सहायता से वंचित कर दिया गया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी की अदालत ने महिला की याचिका को स्वीकार करते हुए मामले की पुनः समीक्षा की। न्यायाधीश ने 2 जून को अपने आदेश में कहा कि अपने खर्चों का प्रबंधन करना पति का व्यक्तिगत दायित्व है।
शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का मामला
पीड़ित महिला का विवाह फरवरी 2013 में हुआ था। याचिका के अनुसार, शादी के कुछ समय बाद ही उसके पति और ससुराल वालों ने उसे दहेज के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। स्थिति तब और बिगड़ गई जब गर्भावस्था के दौरान महिला को उसके ससुराल से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद से, वह 2015 से अपने बेटे के साथ अलग रह रही थी और बच्चे की सभी आवश्यकताओं को अकेले ही पूरा कर रही थी।
समझौते की असफलता
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, 2015 में एक फैमिली कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद दोनों पक्षों के बीच एक समझौता हुआ था। इस सुलह के बाद, वे कुछ महीनों के लिए एक किराए के मकान में साथ रहे, लेकिन उनके रिश्ते में कड़वाहट कम नहीं हुई और वे फिर से अलग हो गए। इसके बाद, सितंबर 2025 में ट्रायल कोर्ट ने ठोस चिकित्सीय साक्ष्य की कमी के कारण महिला की शिकायत को खारिज कर दिया।
पिता के लिए भरण-पोषण की अनिवार्यता
हालांकि अपीलीय अदालत ने माना कि शारीरिक हिंसा के पुख्ता सबूत नहीं हैं, लेकिन पिता 2015 से बच्चे को वित्तीय सहायता देने में पूरी तरह असफल रहा है। कोर्ट ने पति के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि महिला शिक्षित है, इसलिए वह राहत की हकदार नहीं है। जज ने स्पष्ट किया कि कमाने की क्षमता होना और वास्तव में कमाना दो अलग बातें हैं। अदालत ने पति को आदेश दिया कि वह अपने बेटे के बालिग होने तक ₹6,000 प्रति माह का भरण-पोषण करे।
