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दिल्ली विश्वविद्यालय में सीटों की कमी: सीयूईटी का प्रभाव

दिल्ली विश्वविद्यालय में सीयूईटी के लागू होने के बाद, कई सीटें खाली रह गई हैं। इस वर्ष की काउंसिलिंग में सैकड़ों सीटें भरी नहीं गई हैं, जिससे छात्रों के लिए दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव आया है। जानें कि कैसे 'एक देश, एक परीक्षा' की नीति ने इस स्थिति को प्रभावित किया है और क्या यह छात्रों के लिए चुनौतियाँ पैदा कर रहा है।
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सीयूईटी के कारण खाली सीटें


केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए सीयूईटी (सेंट्रल यूनिवर्सिटी एंट्रेस टेस्ट) के लागू होने के बाद, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी सीटें खाली रह गई हैं। इस वर्ष अब तक कई काउंसिलिंग राउंड हो चुके हैं, फिर भी सैकड़ों सीटें खाली हैं। अदिति कॉलेज में 600 सीटें, एक अन्य कॉलेज में 400 और एक और कॉलेज में 3 सीटें खाली पाई गई हैं। पिछले साल, दिल्ली विश्वविद्यालय में 7000 सीटें खाली रह गई थीं। ध्यान दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय में कुल 71,000 से अधिक सीटें हैं, जिनमें से लगभग 10 प्रतिशत सीटें अभी भी भरी नहीं गई हैं।


यदि हम देशभर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह संख्या और भी अधिक हो सकती है। पहले, 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर छात्रों का दाखिला होता था। हालांकि, कुछ प्रमुख विश्वविद्यालयों को छोड़कर, अधिकांश केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्थानीय या आस-पास के राज्यों के छात्रों का ही दाखिला होता था। लेकिन केंद्रीकृत परीक्षा ने इस प्रक्रिया को बदल दिया है। अब यह संभव है कि तेलंगाना का छात्र बिहार के केंद्रीय विश्वविद्यालय में दाखिला ले। लेकिन क्या वह वहां पढ़ाई के लिए जाएगा? वह दिल्ली आ सकता है, लेकिन बिहार या उत्तर प्रदेश में पढ़ाई करने का क्या कारण होगा? यदि उसे दिल्ली में भी मनपसंद कॉलेज नहीं मिला, तो वह दाखिला नहीं लेगा। हालांकि, यदि नजदीकी छात्रों को पसंद का कॉलेज नहीं मिला, तो वे दाखिला ले सकते हैं। सीयूईटी ने इस संभावना को काफी हद तक कम कर दिया है। 'एक देश, एक परीक्षा' की नीति भी इस स्थिति में बाधा डाल रही है।