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पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय: पदोन्नति का अधिकार नहीं है मौलिक

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण मामले में निर्णय दिया है कि सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति का अधिकार है, लेकिन यह उनका मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी सेवानिवृत्ति से पहले उच्च पद का कार्यभार नहीं संभालता है, तो उसे बाद में पदोन्नति या वित्तीय लाभ नहीं मिल सकते। जानें इस मामले में याचिकाकर्ता ने क्या कहा और अदालत ने क्या निर्णय लिया।
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पदोन्नति का अधिकार और न्यायालय का निर्णय


चंडीगढ़: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामले में यह स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार है, लेकिन यह उसका मौलिक अधिकार नहीं है।


अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई कर्मचारी सेवानिवृत्ति से पहले उच्च पद का कार्यभार नहीं संभाल पाता है, तो उसे बाद में नोटनल पदोन्नति या उससे जुड़े वित्तीय लाभ नहीं मिल सकते। खंडपीठ में शामिल जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी और जस्टिस अमरजोत भट्टी ने पूर्व पंचायत सचिव इंदर राज भाटिया की अपील को खारिज करते हुए एकल पीठ के 1 अप्रैल 2026 के निर्णय को बरकरार रखा।


याचिकाकर्ता की स्थिति

याचिकाकर्ता ने अदालत को क्या बताया?


याचिकाकर्ता ने अदालत को सूचित किया कि उनकी नियुक्ति 23 अगस्त 1974 को जालंधर जिले के फिल्लौर में पंचायत सचिव के रूप में हुई थी। वर्ष 2004 में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ था, लेकिन विशेष अदालत ने 23 मई 2014 को उन्हें बरी कर दिया।


उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 में पंचायत अधिकारी के 22 रिक्त पदों को भरने के लिए पदोन्नति प्रक्रिया आरंभ की गई थी। विभाग ने वरिष्ठता के आधार पर अधिकारियों का रिकॉर्ड भी मांगा था, लेकिन प्रशासनिक देरी के कारण यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। इस बीच, वह 30 अप्रैल 2006 को सेवानिवृत्त हो गए, जबकि जूनियर कर्मचारियों को 21 अगस्त 2006 को पदोन्नत किया गया।


अदालत से याचिका

अदालत से क्या रखी थी मांग?


उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें भी नोटनल पदोन्नति देकर उनकी वरिष्ठता, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का पुनर्निर्धारण किया जाए। हालांकि, अदालत ने इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।


उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही स्पष्ट किया है कि पदोन्नति उस दिन से प्रभावी होती है, जब कर्मचारी वास्तव में उच्च पद का कार्यभार संभालता है। केवल पद रिक्त होने या पदोन्नति की सिफारिश होने से किसी कर्मचारी को पदोन्नति का अधिकार नहीं मिलता। अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई कर्मचारी उच्च पद पर कार्य नहीं करता है, तो वह उस पद से जुड़े वेतन, भत्ते और अन्य वित्तीय लाभों का दावा नहीं कर सकता।