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पंजाब सरकार किसानों को राहत देने के लिए वॉटर सेस समाप्त करने की योजना बना रही है

पंजाब सरकार किसानों को राहत देने के लिए वॉटर सेस समाप्त करने की योजना बना रही है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने जल संसाधन विभाग को इस संबंध में प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इस निर्णय का उद्देश्य नहरों के पानी के अधिक उपयोग को प्रोत्साहित करना है, जिससे भूजल संकट से निपटने में मदद मिलेगी। जानें इस योजना के पीछे के कारण और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
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पंजाब सरकार किसानों को राहत देने के लिए वॉटर सेस समाप्त करने की योजना बना रही है

किसानों के लिए राहत की नई पहल


पंजाब सरकार किसानों को महत्वपूर्ण राहत प्रदान करने की दिशा में कदम उठा रही है। राज्य सरकार नहरों से सिंचाई के लिए पानी लेने पर लागू वॉटर सेस को समाप्त करने की योजना बना रही है। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने जल संसाधन विभाग को इस संबंध में प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इस निर्णय का उद्देश्य किसानों को ट्यूबवेल के बजाय नहरों के पानी का अधिक उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना है।


वॉटर सेस का इतिहास

वॉटर सेस को 2014 में तत्कालीन अकाली-भाजपा सरकार द्वारा लागू किया गया था। इससे पहले, किसान नहर के पानी के उपयोग के लिए 'आबियाना' नामक शुल्क अदा करते थे। सरकार का मानना है कि अब इस शुल्क को समाप्त कर भूजल के दोहन को कम करने और नहर आधारित सिंचाई को बढ़ावा देने का सही समय है।


भूजल संकट से निपटने की रणनीति

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पंजाब में घटते भूजल स्तर को लेकर चिंता व्यक्त की है। राज्य के कई क्षेत्रों में भूमिगत जल भंडार कमजोर हो रहे हैं, जिससे जल संकट की संभावना बढ़ रही है। सरकार का मानना है कि यदि किसान नहरों के पानी का अधिक उपयोग करेंगे, तो भूजल पर निर्भरता कम होगी और जल संसाधनों का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। इस दिशा में सरकार ने जलमार्गों और वितरिकाओं के पुनर्जीवन का कार्य शुरू कर दिया है।


योजना के चरण

योजना के पहले चरण में नहर नेटवर्क को मजबूत करने पर ध्यान दिया गया है, जबकि दूसरे चरण में यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि नहर का पानी गांवों के अंतिम छोर तक स्थित खेतों तक पहुंच सके। हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री मान ने कहा कि जहां राज्य सरकार किसानों को भूजल निकालने के लिए भारी बिजली सब्सिडी दे रही है, वहीं नहर सिंचाई के लिए वॉटर सेस वसूला जा रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि यह शुल्क समाप्त कर दिया जाए, तो अधिक किसान नहर के पानी का उपयोग करने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।


सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण

जल संसाधन विभाग ने इस संबंध में आवश्यक आंकड़े सरकार को उपलब्ध कराए हैं। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले चार वर्षों में सरकार को वॉटर सेस के रूप में लगभग 360 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद थी, लेकिन वास्तविक वसूली केवल 3.75 करोड़ रुपये ही हो सकी। यह निर्धारित लक्ष्य का महज 1.04 प्रतिशत है। अधिकारियों का मानना है कि इस शुल्क से राज्य को कोई महत्वपूर्ण राजस्व प्राप्त नहीं हो रहा है।


वॉटर सेस की व्यवस्था

वॉटर सेस की व्यवस्था 2014 में 'इंडियन कैनाल एंड ड्रेनेज एक्ट, 1873' में संशोधन के बाद लागू की गई थी। इसके तहत किसानों से प्रति फसल प्रति एकड़ 50 रुपये शुल्क लिया जाता था। इस राशि का उपयोग नहरों, वितरिकाओं और अन्य सिंचाई प्रणालियों के रखरखाव, मरम्मत और आधुनिकीकरण के लिए किया जाना था। पंजाब में खेती के लिए उपयोग होने वाले ट्यूबवेलों को आज भी मुफ्त बिजली दी जाती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रत्येक कृषि बिजली कनेक्शन पर सालाना औसतन करीब 55 हजार रुपये की सब्सिडी दी जाती है।