भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग में नया मोड़
भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जिसमें आर्कटिक क्षेत्र से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) खरीदने की संभावनाएं शामिल हैं। रूस के उप विदेश मंत्री ने बताया कि दोनों देशों के बीच तेल और गैस क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने के लिए संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। व्लादी बोस्तोक-चेन्नई समुद्री कॉरिडोर व्यापार को तेज करने की एक महत्वपूर्ण योजना है। हालांकि, अमेरिका के संभावित प्रतिबंधों का असर भी भारत-रूस ऊर्जा व्यापार पर पड़ सकता है। जानें इस सहयोग के पीछे की रणनीतियाँ और वैश्विक राजनीति का प्रभाव।
| Jul 29, 2026, 19:35 IST
भारत-रूस ऊर्जा सहयोग का नया चरण
भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग अब एक नई दिशा में बढ़ता हुआ नजर आ रहा है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत रूस के आर्कटिक क्षेत्र से तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) खरीदने के विकल्प पर विचार कर रहा है। रूस के उप विदेश मंत्री आनंद्रे रुडेंको ने बताया कि दोनों देशों के बीच तेल और गैस क्षेत्र में सहयोग को और बढ़ाने की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। भारत पहले से ही कई रूसी ऊर्जा परियोजनाओं में शामिल है, और अब उसकी नजर आर्कटिक क्षेत्र से आने वाली एलएनजी सप्लाई पर है। आर्कटिक में रूस के पास प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं। एलएनजी को तरल रूप में परिवर्तित कर समुद्र के रास्ते लंबी दूरी तक भेजा जाता है। यदि भारत और रूस के बीच यह समझौता आगे बढ़ता है, तो भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति के नए विकल्प खुल सकते हैं। रूस ने यह भी कहा कि दोनों देश लॉजिस्टिक्स और समुद्री परिवहन में सहयोग बढ़ाने पर काम कर रहे हैं, जिसमें व्लादी बोस्तोक से चेन्नई के समुद्री मार्ग और उत्तरी समुद्री मार्ग के उपयोग की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है।
व्लादी बोस्तोक-चेन्नई समुद्री कॉरिडोर
व्लादी बोस्तोक-चेन्नई समुद्री कॉरिडोर भारत और रूस के बीच व्यापार को बढ़ावा देने की एक महत्वपूर्ण योजना है। यह मार्ग रूस के पूर्वी हिस्से को भारत के पूर्वी तट से जोड़ने में सक्षम है, जिससे ऊर्जा, खनिज और अन्य सामानों के परिवहन में तेजी आएगी। रूस के अधिकारियों के अनुसार, दोनों देश उत्तरी समुद्री मार्ग पर माल ढुलाई सहयोग को लेकर समझौते की तैयारी कर रहे हैं। भारत और रूस के बीच दशकों से रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा और व्यापार जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग रहा है। विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में, रूस भारत के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बनकर उभरा है। यूक्रेन युद्ध के बाद, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, तब भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई। भारत का मानना है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और वह विश्व में जहां से बेहतर कीमत और भरोसेमंद सप्लाई मिलेगी, वहां से खरीद जारी रखेगा। रूस से तेल खरीद को लेकर पश्चिमी देशों ने कई बार सवाल उठाए हैं।
अमेरिका का दबाव और भारत की नीति
अमेरिका और उसके सहयोगियों ने रूस की ऊर्जा आय को लेकर चिंताएं जताई हैं और मॉस्को पर आर्थिक दबाव बनाए रखने की कोशिश की है। हालांकि, भारत पर भी दबाव बनाया गया, लेकिन उसने रूस से व्यापार जारी रखा। अमेरिका में रूस की ऊर्जा खरीद करने वाले देशों पर कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी सीनेट में रूस की ऊर्जा बिक्री से जुड़े प्रतिबंधों वाले एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाया गया है, और यदि यह कानून बनता है, तो रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ सकता है। भारत उन देशों में शामिल है जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते हैं। ऐसे में अमेरिका के संभावित प्रतिबंधों का असर भारत-रूस ऊर्जा व्यापार पर पड़ सकता है। फिर भी, भारत ने अपनी नीति को स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा खरीद देश की आर्थिक जरूरतों और लोगों के हितों को ध्यान में रखकर की जाती है। भारत ने बार-बार यह कहा है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना आवश्यक है। रूस से एलएनजी और तेल सहयोग बढ़ाना भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकता है, जबकि रूस के लिए भारत एक बड़ा और विश्वसनीय ऊर्जा बाजार है। बदलती वैश्विक राजनीति के बीच, भारत एक ओर रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को बनाए रखना चाहता है।
