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भारत के छात्रों की एआई के प्रति चिंताएं और आशाएं

हाल ही में एक वैश्विक सर्वेक्षण में भारत के छात्रों ने कृत्रिम मेधा (एआई) के प्रभाव पर अपनी चिंताओं और आशाओं को व्यक्त किया है। 82 प्रतिशत छात्रों ने पारंपरिक अध्ययन विधियों का महत्व बताया, जबकि 78 प्रतिशत ने एआई द्वारा नए रोजगार के अवसरों की संभावना पर विश्वास जताया। रिपोर्ट में शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता और रचनात्मकता तथा आलोचनात्मक सोच के महत्व पर जोर दिया गया है। जानें इस रिपोर्ट में और क्या कहा गया है और भारतीय छात्रों का भविष्य कैसा दिखता है।
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कृत्रिम मेधा के प्रभाव पर छात्रों की राय

(अदिति खन्ना) लंदन, 21 अक्टूबर - भारत के अधिकांश छात्र इस बात को लेकर चिंतित हैं कि कृत्रिम मेधा (एआई) के उपयोग से उनका कार्य तेजी से हो रहा है, लेकिन वे विषयों को गहराई से नहीं समझ पा रहे हैं। यह निष्कर्ष ब्रिटेन में हाल ही में प्रकाशित एक वैश्विक सर्वेक्षण में सामने आया है। ‘एचपी फ्यूचर्स 2026’ रिपोर्ट के लिए विश्वभर में छह हजार से अधिक छात्रों का सर्वेक्षण किया गया, जिसमें भारत के 758 छात्र शामिल थे।


पारंपरिक अध्ययन विधियों का महत्व

सर्वेक्षण में पाया गया कि 82 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि जब वे अध्ययन की गई सामग्री को लंबे समय तक याद रखना चाहते हैं, तो वे प्रिंट निकालने या हाथ से नोट्स बनाने जैसे पारंपरिक तरीकों का सहारा लेते हैं। भारतीय छात्र भविष्य के रोजगार के लिए एआई के साथ-साथ रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच जैसे कौशल को महत्वपूर्ण मानते हैं। एचपी के मुख्य वाणिज्यिक अधिकारी डेविड मैकक्वेरी ने कहा कि शिक्षकों, नीति निर्माताओं और नियोक्ताओं की यह जिम्मेदारी है कि वे युवाओं को जीवन और करियर में आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करें।


भविष्य के लिए आशावाद

रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय छात्र एआई आधारित भविष्य के प्रति आशावादी हैं, भले ही सोचने-समझने की क्षमता में कमी आने की आशंका हो। सर्वेक्षण में शामिल 78 प्रतिशत छात्रों का मानना है कि एआई जितने रोजगार खत्म करेगा, उससे अधिक नए अवसर पैदा करेगा। 87 प्रतिशत छात्रों ने विश्वास जताया कि वे अपने करियर में एआई उपकरणों का प्रभावी और जिम्मेदारी से उपयोग कर सकेंगे।


शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता

92 प्रतिशत छात्रों का मानना है कि उनकी शिक्षा उन्हें कार्यस्थल के लिए तैयार कर रही है। एचपी में शिक्षा कारोबार एवं रणनीति के निदेशक मयंक धींगरा ने कहा कि भारतीय छात्रों ने यह स्पष्ट किया है कि उन्हें एआई के उपयोग में भरोसा है, लेकिन वे विषयों की गहराई से समझ की कमी को लेकर चिंतित हैं। रिपोर्ट में नीति निर्माताओं से अपील की गई है कि वे भविष्य के कार्यस्थलों के लिए आवश्यक कौशल विकसित करने के लिए स्पष्ट योजनाएं बनाएं।


रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच का महत्व

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच जैसे कौशल को अन्य विषयों की तुलना में कम महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। शिक्षा में पढ़ने-लिखने, गणना करने और व्यक्तित्व विकास से संबंधित शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके साथ ही, बुनियादी ज्ञान और दीर्घकालिक उपयोगी कौशल सिखाने के लिए रचनात्मक और व्यावहारिक तरीकों का उपयोग किया जाना चाहिए।