भारत ने यूएन से पीओके में मानवाधिकारों की स्थिति पर रिपोर्ट की मांग की
भारत की चिंता: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन
(योषिता सिंह) संयुक्त राष्ट्र, 15 अक्टूबर - भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय से यह जानना चाहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में हुई मौतों, इंटरनेट पर प्रतिबंध और मानवाधिकारों की गंभीर स्थिति के संबंध में उठाए गए कदमों पर रिपोर्ट कब जारी की जाएगी। भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र की तीसरी समिति में यह बयान दिया। उन्होंने मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) और मानवाधिकार उच्चायुक्त द्वारा पीओके की स्थिति पर दिए गए विस्तृत बयानों का उल्लेख किया।
इन बयानों में सशस्त्र बलों और सुरक्षा बलों द्वारा की गई मौतों की त्वरित, गहन और निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी। इसके साथ ही हिरासत में लिए गए 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' के नेताओं को कानूनी सहायता प्रदान करने, उनके परिवारों से मिलने की अनुमति देने और उचित कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करने की भी मांग की गई थी। इसके अलावा, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर प्रतिबंध हटाने और स्थानीय लोगों की शिकायतों के समाधान के लिए सार्थक राजनीतिक संवाद की सिफारिश की गई थी।
स्वरूप ने कहा, 'हम ओएचसीएचआर से यह जानने की उम्मीद कर रहे हैं कि पाकिस्तान सरकार ने इन मुद्दों के समाधान के लिए क्या कदम उठाए हैं। पाकिस्तान के लिए यह बेहतर होगा कि वह अपने भीतर झांके और विचार करे कि खैबर पख्तूनख्वा और रावलकोट जैसे क्षेत्रों में इन अधिकारों का पालन क्यों नहीं हो रहा है।' उन्होंने यह भी कहा कि हमारे पड़ोस में और पश्चिम में प्रदर्शनों पर हुई हिंसक कार्रवाई पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है। ऐसे दोहरे मानदंड बहुपक्षीयता और ओएचसीएचआर के कार्यों में विश्वास की कमी पैदा करते हैं।
भारत की यह टिप्पणी उस समय आई है जब हाल ही में नई दिल्ली ने राष्ट्रीय राजधानी में विरोध प्रदर्शनों को लेकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की टिप्पणियों को देश के आंतरिक मामलों में 'अनावश्यक' और 'अस्वीकार्य हस्तक्षेप' करार दिया था।
पिछले सप्ताह, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने दिल्ली में प्रदर्शनों के संदर्भ में प्रदर्शनकारियों, विपक्ष के नेताओं, नागरिक समाज संगठनों के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों के 'सामूहिक रूप से हिरासत में लिए जाने की खबरों' पर चिंता व्यक्त की थी।
