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भारतीय डॉक्टर ने साझा किए यूरोपियन माता-पिता के पालन-पोषण के अनोखे तरीके

डॉक्टर सुखमनी गुंबर ने यूरोप की यात्रा के दौरान माता-पिता की कुछ अनोखी आदतों का अवलोकन किया है, जो बच्चों की परवरिश में मददगार साबित हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि कैसे यूरोपियन माता-पिता अपने बच्चों को जीवन का हिस्सा बनाते हैं और उन्हें बोरियत से रचनात्मकता विकसित करने का अवसर देते हैं। इसके अलावा, उन्होंने सही शिष्टाचार और खाने के प्रति सकारात्मक नजरिया रखने के महत्व पर भी जोर दिया है। इस लेख में जानें कि कैसे ये तरीके बच्चों को आत्मनिर्भर और मानसिक रूप से मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं।
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बच्चों की परवरिश में तनाव से बचें

नई दिल्ली: बच्चों की परवरिश को लेकर माता-पिता अक्सर तनाव में रहते हैं और कई जटिल नियमों का पालन करते हैं। लेकिन क्या बच्चों को स्वाभाविक रूप से बढ़ने देना बेहतर नहीं है? हाल ही में एक भारतीय डॉक्टर की पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें उन्होंने यूरोप की अपनी एक महीने की यात्रा के दौरान वहां के माता-पिता की कुछ खास आदतों का अवलोकन किया और साझा किया है। डॉक्टर सुखमनी गुंबर, जो मातृत्व और स्वास्थ्य पर अपने विचार साझा करती हैं, ने अपनी पोस्ट में यूरोपियन माता-पिता की उन आदतों का उल्लेख किया है जिन्हें वह खुद भी अपनाना चाहती हैं। उनकी इस पोस्ट को अब तक 1 लाख 73 हजार से अधिक लोग देख चुके हैं और इस संतुलित दृष्टिकोण की सराहना कर रहे हैं। डॉ. गुंबर का यह संदेश माता-पिता को परफेक्शन के पीछे भागने के बजाय बच्चों पर भरोसा करने और तनाव कम लेने की प्रेरणा देता है।


बच्चों को जीवन का हिस्सा बनाएं

हर योजना का केंद्र न हों बच्चे


डॉक्टर गुंबर के अनुसार, यूरोप में माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी केवल बच्चों के इर्द-गिर्द नहीं समेटते हैं। इसके बजाय, वे बच्चों को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाते हैं। चाहे कैफे में खाना हो, यात्रा करना हो या बाजार के काम निपटाने हों, वे बच्चों को हर जगह साथ रखते हैं। डॉ. गुंबर का मानना है कि बच्चों को ऐसे वास्तविक माहौल में जितना ज्यादा शामिल किया जाता है, वे उतनी ही जल्दी परिस्थितियों के अनुकूल ढलना सीख जाते हैं।


बोरियत से बढ़ती है रचनात्मकता

बोरियत से बढ़ती है रचनात्मकता और धैर्य


आज के डिजिटल युग में माता-पिता पर बच्चों का मनोरंजन करने और उन्हें स्क्रीन से चिपकाए रखने का भारी दबाव होता है। लेकिन डॉ. गुंबर इसे गैर-जरूरी मानती हैं। उनका कहना है कि बच्चों को कुछ समय बिना खिलौने, गैजेट या किसी भी तय गतिविधि के खाली बैठने देना चाहिए। यह 'बोरियत' वास्तव में उनके अंदर धैर्य, रचनात्मकता और भावनात्मक मजबूती पैदा करती है, जो आज के समय में बेहद कीमती गुण हैं।


सही शिष्टाचार की आदत डालें

बचपन से ही डालें सही शिष्टाचार की आदत


ज्यादातर माता-पिता यह सोचते हैं कि बच्चे बड़े होकर अपने आप मैनर्स सीख जाएंगे, लेकिन यूरोपियन माता-पिता ऐसा नहीं मानते। डॉ. गुंबर ने गौर किया कि बच्चे बहुत कम उम्र से ही सामाजिक व्यवहार सीखने में सक्षम होते हैं। एक जगह बैठकर शांति से खाना खाना, सार्वजनिक स्थानों का सम्मान करना और बुनियादी शिष्टाचार का पालन करना जैसी छोटी-छोटी आदतें बच्चों को अलग-अलग माहौल में अधिक आत्मविश्वासी और समझदार बनाती हैं।


खाने के प्रति सकारात्मक नजरिया

खाने के प्रति बनाएं सकारात्मक नजरिया


बच्चों को अक्सर कुछ खास चीजों को खाने से डराया जाता है या उन्हें 'बुरा' कहा जाता है। इसके विपरीत, डॉ. गुंबर भोजन में संतुलन बनाने की सलाह देती हैं। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं। इसलिए बेवजह की पाबंदियां लगाने के बजाय, माता-पिता को खुद एक स्वस्थ डाइट लेकर बच्चों के सामने रोल मॉडल बनना चाहिए। अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा अच्छा खाना खाए, तो इसकी शुरुआत आपकी अपनी प्लेट से होनी चाहिए।


बच्चों के नखरों पर शांत रहना

बच्चों के नखरों पर शांत रहना है सबसे बड़ी कला


डॉक्टर गुंबर ने जो सबसे बड़ा अंतर देखा, वह यह था कि जब बच्चे पब्लिक प्लेस पर रोते-चिल्लाते या गुस्सा करते हैं, तो यूरोपियन माता-पिता कैसे रिएक्ट करते हैं। सार्वजनिक जगहों पर बच्चों के नखरों पर वे शर्मिंदगी या गुस्से से प्रतिक्रिया नहीं देते। इसके बजाय, वे बच्चों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने देते हैं और जब सब शांत हो जाते हैं, तब उस स्थिति पर आराम से बात करते हैं। यह तरीका बच्चों को अपनी भावनाओं पर काबू पाना सिखाता है, न कि अपने मन की बात कहने पर सजा का डर पैदा करता है। यही वजह है कि बिना किसी तनाव के बच्चों को आत्मनिर्भर और मानसिक रूप से मजबूत बनाने वाले ये व्यावहारिक टिप्स इंटरनेट पर छाए हुए हैं।