भारतीय सेना के कुत्तों की अद्वितीय भूमिका और देखभाल
सेना के कुत्तों का महत्व
भारतीय सेना में प्रशिक्षित कुत्ते केवल सुरक्षा के लिए नहीं होते, बल्कि वे कई मिशनों में सैनिकों के महत्वपूर्ण सहयोगी होते हैं। इनका उपयोग विस्फोटकों और खदानों की पहचान, संदिग्ध वस्तुओं की खोज, ट्रैकिंग, सुरक्षा और बचाव अभियानों में किया जाता है। इनकी सूंघने की अद्भुत क्षमता कई बार ऐसे खतरों का पता लगाने में मदद करती है, जिन्हें मानव आसानी से नहीं पहचान पाता।
सेवानिवृत्त कुत्तों की देखभाल
मानव सैनिकों की तरह, सेना के कुत्तों को सेवानिवृत्ति के बाद मासिक वेतन या पेंशन नहीं मिलती। लेकिन उनकी जिम्मेदारियां समाप्त नहीं होतीं। सेना और सरकार इनकी देखभाल, भोजन और चिकित्सा का प्रबंध करती हैं, ताकि लंबे समय तक देश की सेवा करने वाले ये कुत्ते बुढ़ापे में सुरक्षित जीवन जी सकें।
मेरठ और हेमपुर में पुनर्वास केंद्र
सेवानिवृत्त सेना के कुत्तों को विशेष पुनर्वास केंद्रों में रखा जाता है। उत्तर प्रदेश के मेरठ में रिमाउंट वेटरनरी कॉर्प्स सेंटर और कॉलेज में वृद्ध आश्रम जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा, उत्तराखंड के हेमपुर में भी इनकी देखभाल की जाती है। यहां उनके भोजन, स्वास्थ्य और अन्य आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है। कुछ मामलों में, आम नागरिक, स्कूल या कुत्ता प्रेमी संगठन इन कुत्तों को गोद ले सकते हैं। इसके लिए संबंधित आरवीसी केंद्र में आवेदन करना होता है।
प्रशिक्षण की प्रक्रिया
सेना के कुत्तों का प्रशिक्षण आमतौर पर छह महीने की उम्र से शुरू होता है। यह प्रशिक्षण लगभग छह से नौ महीने तक चलता है और इसमें उनकी क्षमताओं के अनुसार विभिन्न जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता है। विस्फोटक खोजने से लेकर ट्रैकिंग और बचाव तक, यह प्रशिक्षण बेहद कठिन और अनुशासित होता है। एक सैन्य कुत्ता सामान्यतः आठ से नौ साल तक सेवा करता है, लेकिन उसकी सेवानिवृत्ति केवल उम्र के आधार पर नहीं होती।
सेना के कुत्तों का सम्मान
सेना के कुत्तों को सैन्य इकाई का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है और उन्हें सेवा संख्या और रैंक भी दी जाती है। असाधारण प्रदर्शन करने वाले कुत्तों को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ द्वारा प्रशस्ति पत्र जैसे सम्मान मिल सकते हैं। कुछ कुत्तों को उनकी सेवा और बलिदान के लिए मरणोपरांत वीरता सम्मान भी प्रदान किया गया है।
