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मतदाता सूची में गड़बड़ी: निर्वाचन आयोग के भीतर बढ़ते मतभेद

हाल ही में निर्वाचन आयोग के भीतर मतदाता सूची को लेकर गंभीर मतभेद सामने आए हैं। 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। निर्वाचन आयुक्तों ने इस प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी की शिकायत की है। क्या नई मतदाता सूची पर आम जनता का विश्वास बना रहेगा? जानें इस विवाद की पूरी कहानी और इसके संभावित परिणाम।
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मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल


हाल ही में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया पर निर्वाचन आयोग के भीतर गंभीर असहमति सामने आई है। निर्वाचन आयुक्तों एस.एस. संधू और विवेक जोशी ने इस प्रक्रिया के दौरान 10 महीनों में 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज की हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, नए मतदाताओं को जोड़ने में अनधिकृत तरीके अपनाने, और राज्यों के अधिकारियों की अनदेखी करने की शिकायत की है।


द इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ है कि एसआईआर प्रक्रिया को लेकर आयोग के भीतर भी संदेह और आपत्तियां उठाई गई हैं। हालांकि, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इन आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। यह स्थिति अभूतपूर्व है और इसके पीछे की ताकत पर सवाल उठाए जा रहे हैं।


इस प्रक्रिया में सॉफ्टवेयर की गड़बड़ी के कारण कई वैध नामों को हटाने की घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे में, यदि निर्वाचन आयोग के दो में से एक आयुक्तों का भी इस नई मतदाता सूची पर भरोसा नहीं है, तो यह सवाल उठता है कि क्या इस सूची के आधार पर होने वाले चुनावों पर आम जनता का विश्वास बना रहेगा। इसलिए, इस पूरी प्रक्रिया को पुनर्विचार की आवश्यकता है। पुरानी सूची को बहाल किया जाना चाहिए और यदि एसआईआर आवश्यक है, तो इसे फिर से सभी को विश्वास में लेकर संपन्न किया जाना चाहिए।