वित्तीय ऑडिट: अपने खर्चों को नियंत्रित करने के लिए 20 मिनट का उपाय
वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए उपाय
कई लोग अच्छी सैलरी के बावजूद महीने के अंत में अपने बजट को बिगड़ता हुआ पाते हैं। इसका मुख्य कारण छोटे-छोटे खर्च, कई ईएमआई और बचत को टालना होता है। ऐसे में हर तीन महीने में केवल 20 मिनट का वित्तीय ऑडिट आपकी आय और खर्चों के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।
1. सभी ईएमआई का मूल्यांकन करें
पहले पिछले तीन महीनों के बैंक स्टेटमेंट निकालें और सभी ईएमआई को एक जगह लिखें। इसमें होम या कार लोन के साथ-साथ छोटी खरीदारी की नो-कॉस्ट ईएमआई भी शामिल करें, क्योंकि ये छोटी किस्तें मिलकर बड़ा बोझ बन सकती हैं। सामान्यतः, कुल ईएमआई को आपकी इन-हैंड सैलरी के 40 प्रतिशत से कम रखना बेहतर होता है।
इसके अलावा, होम लोन की किस्त 30 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए, ताकि बजट पर दबाव कम रहे। इसके बाद, ओटीटी, ऐप रिन्यूअल, फूड डिलीवरी शुल्क और जिम जैसी नियमित कटौतियों पर भी ध्यान दें। ये खर्च छोटे लग सकते हैं, लेकिन हर महीने हजारों रुपये बढ़ा सकते हैं।
2. सैलरी आते ही बचत करें
महीने के अंत में बची रकम को निवेश करने की योजना अक्सर सफल नहीं होती। बेहतर यह है कि सैलरी खाते में आते ही बचत और निवेश की राशि अलग कर दी जाए। इसके लिए महीने की 1 या 2 तारीख को एसआईपी का ऑटो-डेबिट सेट किया जा सकता है।
इससे खर्च के लिए उपलब्ध राशि पहले से तय हो जाती है और अनावश्यक खर्च पर नियंत्रण रहता है। निवेश शुरू करने से पहले लगभग छह महीने के आवश्यक खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड बनाना भी आवश्यक है। इसे ऐसे साधन में रखा जा सकता है, जहां जरूरत पड़ने पर पैसा आसानी से मिल सके।
3. अपनी वास्तविक बचत दर जानें
यह देखना पर्याप्त नहीं है कि महीने में कितने रुपये बच रहे हैं। अपनी बचत दर निकालना अधिक उपयोगी है। इसके लिए कुल मासिक बचत को इन-हैंड सैलरी से भाग देकर प्रतिशत निकालें। यदि बचत 10 प्रतिशत से कम है, तो यह खर्चों की समीक्षा करने का संकेत है।
10 से 20 प्रतिशत बचत सामान्य स्तर मानी जाती है, जबकि 25 प्रतिशत से अधिक बचत लंबे समय में संपत्ति निर्माण की बेहतर क्षमता दर्शाती है। 1 लाख रुपये की इन-हैंड सैलरी पर 20 प्रतिशत बचत का मतलब हर महीने 20,000 रुपये अलग रखना होगा। अपनी वास्तविक स्थिति के अनुसार लक्ष्य तय करना अधिक व्यावहारिक है।
4. हर तीन महीने में मनी ऑडिट करें
पैसे बचाने की आदत एक बार का निर्णय नहीं है। हर तीन महीने में लगभग 20 मिनट निकालकर ईएमआई, सब्सक्रिप्शन, बचत, निवेश और आवश्यक खर्चों की पुनरावलोकन करें। यदि ईएमआई 40 प्रतिशत से ऊपर पहुंच रही है, तो नए कर्ज से बचना समझदारी होगी।
इसी तरह, गैर-जरूरी सब्सक्रिप्शन को बंद करने से बची रकम को निवेश या इमरजेंसी फंड में भेजा जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सैलरी बढ़ने के साथ खर्च भी उसी अनुपात में न बढ़े। पहले बचत की राशि तय करें, फिर बाकी पैसे से खर्च का बजट बनाएं। यही अनुशासन धीरे-धीरे वित्तीय सुरक्षा को मजबूत कर सकता है।
