शिक्षा क्षेत्र में विवादों का सिलसिला: क्या सुधार की राह में बाधाएं हैं?
शिक्षा में विवादों का इतिहास
केंद्र में नरेंद्र मोदी के शासन के बाद से शिक्षा क्षेत्र में कई विवाद उठ चुके हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की घटना से लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए प्रदर्शनों तक, देश ने कई महत्वपूर्ण घटनाओं का सामना किया है। जेएनयू में प्रदर्शन के दौरान कुछ ऐसे नारे लगे थे, जिनसे 'टुकड़े टुकड़े गैंग' का जुमला प्रचलित हुआ। जामिया विश्वविद्यालय का विवाद, पुलिस की कार्रवाई, और दिल्ली विश्वविद्यालय में नियुक्तियों के मुद्दे भी चर्चा का विषय बने रहे हैं। नई शिक्षा नीति और दिल्ली विश्वविद्यालय में चार साल के अंडरग्रेजुएट कोर्स की शुरुआत जैसे मुद्दों ने भी विवादों को जन्म दिया है। इस सरकार के पहले शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी से लेकर वर्तमान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तक, सभी के कार्यकाल में कोई न कोई विवाद सामने आया है।
नीट यूजी परीक्षा में पेपर लीक का मुद्दा
वर्तमान में, पूरा देश नीट यूजी परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ हो रहे आंदोलनों को देख रहा है। 2024 और 2026 की परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। पिछले एक दशक में डेढ़ सौ से अधिक परीक्षाओं के पेपर लीक हो चुके हैं। इस बार दो बार परीक्षा आयोजित की गई है और इसी विवाद के चलते सरकार ने अगले साल कंप्यूटर आधारित परीक्षा कराने का निर्णय लिया है। सरकार एक बार में दो लाख छात्रों के लिए कंप्यूटर आधारित परीक्षा आयोजित कर सकती है। यदि 24 लाख छात्र परीक्षा में शामिल होते हैं, तो सरकार छह दिन में 12 पालियों में परीक्षा आयोजित करेगी। ऐसे में अंकों के सामान्यीकरण में गड़बड़ी की संभावना बढ़ जाती है।
सीबीएसई की ऑनस्क्रीन मार्किंग की घोषणा
नीट यूजी परीक्षा में गड़बड़ियों के बीच, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 12वीं की परीक्षा के पेपर ऑनस्क्रीन जांचने की घोषणा की। चूंकि यह प्रक्रिया बिना किसी तैयारी के की गई थी, इसलिए छात्रों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, सरकार ने इस प्रणाली को जारी रखने का निर्णय लिया है। यह सुधार नहीं, बल्कि समस्याओं को बढ़ाने वाला कदम है। शिक्षा और परीक्षा की व्यवस्था में मौलिक बदलाव की आवश्यकता है।
शिक्षा बजट में कमी और उसके प्रभाव
सरकार को शिक्षा में सुधार के लिए गंभीरता दिखानी होगी, जो पिछले 12 वर्षों से गायब है। केंद्रीय बजट में शिक्षा का हिस्सा लगातार घट रहा है। 2013-14 में शिक्षा मंत्रालय का हिस्सा 4.6 प्रतिशत था, जो अब घटकर 2.5 प्रतिशत रह गया है। यह स्थिति दर्शाती है कि शिक्षा पर सरकार का खर्च हर साल औसतन 10 प्रतिशत बढ़ना चाहिए था, लेकिन इसके विपरीत हुआ है। इस कमी का असर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अनुपस्थिति के रूप में सामने आ रहा है।
भारत की शिक्षा प्रणाली की चुनौतियाँ
भारत शिक्षा में पिछड़ रहा है और अनुसंधान एवं विकास में भी। केवल अच्छी सड़कों और ऊंची इमारतों से देश को विकसित नहीं बनाया जा सकता। शिक्षा में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि छात्रों और अभिभावकों का विश्वास बहाल किया जा सके।
