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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन की सीमाएं तय होनी चाहिए

सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक स्थलों पर धरना-प्रदर्शन के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी संगठन अनिश्चितकाल तक किसी स्थान पर कब्जा नहीं कर सकता। व्यापारियों ने प्रदर्शनों के कारण 2,000 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा किया है। अदालत ने सभी संगठनों को समान अवसर देने के लिए समय सीमा तय करने की आवश्यकता पर जोर दिया। जानें इस मामले में और क्या कहा गया।
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सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

नई दिल्ली: सार्वजनिक स्थलों पर लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी संगठन किसी सार्वजनिक स्थान पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं कर सकता। यहां तक कि उन स्थानों पर भी, जो विशेष रूप से धरना-प्रदर्शन के लिए निर्धारित हैं, समय की सीमा होनी चाहिए, ताकि अन्य संगठनों और व्यक्तियों को अपनी आवाज उठाने का अवसर मिल सके।


CJI सूर्यकांत का बयान

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि किसी एक संगठन को हमेशा के लिए किसी स्थान पर कब्जा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।


प्रदर्शनों से व्यापार पर प्रभाव

सुनवाई के दौरान, दिल्ली में अक्टूबर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से संबंधित याचिकाओं पर चर्चा की गई। इन याचिकाओं में पुलिस की कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों की हिरासत, निगरानी व्यवस्था, प्रदर्शन स्थलों और व्यापारियों को हुए नुकसान जैसे मुद्दे शामिल थे।


CJI का सवाल: किसान और मजदूर कहां जाएंगे?

CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी संगठन सार्वजनिक स्थान पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि एक संगठन लगातार उसी स्थान पर प्रदर्शन करता है, तो किसान, पत्रकार, मजदूर और अन्य प्रदर्शनकारी अपनी बात रखने के लिए कहां जाएंगे?


व्यापारियों का नुकसान

दिल्ली के व्यापारिक संगठनों के वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि प्रदर्शनों के कारण व्यापार पर बुरा असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि त्योहारों के महत्वपूर्ण सीजन में कई दुकानें बंद रहीं, जिससे व्यापारियों को लगभग 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।


प्रदर्शन की अनुमति और अवधि

दिल्ली पुलिस के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए केवल एक दिन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी 17 दिनों तक वहां बैठे रहे।


हिरासत में लिए गए लोग

वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने प्रदर्शन के दौरान लगभग 7,000 लोगों को हिरासत में लेने का मुद्दा उठाया। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इन लोगों को हिरासत में नहीं लिया गया था, बल्कि उन्हें प्रदर्शन स्थल से हटाया गया था।


प्रदर्शनकारियों की निगरानी

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने प्रदर्शनकारियों की निगरानी का मुद्दा उठाते हुए सरकार से पूछा कि किस कानून के तहत यह निगरानी की जा रही थी। तुषार मेहता ने कहा कि केवल सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से निगरानी की गई थी।


अलग-अलग पक्षों की दलीलें

इस मामले की सुनवाई के दौरान कई वरिष्ठ अधिवक्ता विभिन्न पक्षों की ओर से पेश हुए। मेनका गुरुस्वामी ने पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया, जबकि अन्य अधिवक्ताओं ने व्यापारियों को हुए नुकसान पर दलीलें दीं।


सुप्रीम कोर्ट का संतुलन बनाने का प्रयास

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि अदालत सार्वजनिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन के अधिकार और आम नागरिकों, व्यापारियों तथा अन्य संगठनों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने के महत्व को समझती है।