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हीट पैक: गर्माहट का विज्ञान और उपयोग

इस लेख में हम हीट पैक के कार्य करने के तरीके और उनके पीछे के रासायनिक विज्ञान की चर्चा करेंगे। जानें कि ये पैक कैसे गर्माहट प्रदान करते हैं और क्यों कुछ एक बार उपयोग होते हैं जबकि अन्य को पुन: इस्तेमाल किया जा सकता है। यह जानकारी सर्दियों में गर्म रहने के लिए बेहद उपयोगी है।
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हीट पैक का महत्व

(एलन ब्लैकमैन, ऑकलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी) ऑकलैंड, चार अगस्त - सर्दियों में कुछ लोग बर्फीले पहाड़ों पर स्कीइंग का आनंद लेते हैं, जबकि अन्य को मजबूरी में खुले आसमान में काम करना पड़ता है। दोनों ही स्थितियों में शरीर को गर्म रखना आवश्यक होता है। लेकिन कभी-कभी केवल गर्म कपड़े पहनना ही पर्याप्त नहीं होता। ऐसे में तुरंत गर्माहट देने वाले ‘हीट पैक’ बहुत उपयोगी साबित होते हैं। जब आप प्लास्टिक पैकेट से ‘हैंड वॉर्मर’ निकालकर जेब में रखते हैं, तो वह धीरे-धीरे गर्म होने लगता है और कई घंटों तक हल्की, आरामदायक गर्माहट प्रदान करता है। यह किसी जादू से कम नहीं लगता। लेकिन ये ‘हीट पैक’ कैसे काम करते हैं? ये इतनी देर तक गर्म कैसे रहते हैं? और कुछ ‘हीट पैक’ दोबारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जबकि कुछ केवल एक बार ही क्यों काम आते हैं? इसके पीछे रसायन विज्ञान के कुछ बुनियादी सिद्धांत हैं।


उष्माक्षेपी अभिक्रिया की समझ

रासायनिक अभिक्रियाओं और भौतिक प्रक्रियाओं को इस आधार पर समझा जाता है कि वे ऊष्मा का क्या करती हैं—क्या वे ऊष्मा को अवशोषित करती हैं या उत्सर्जित करती हैं। जो प्रक्रिया अपने आसपास के वातावरण से ऊष्मा ग्रहण करती है, उसे उष्माशोषी (एंडोथर्मिक) प्रक्रिया कहा जाता है। सामान्य तापमान पर बर्फ का पिघलना इसका एक उदाहरण है। इसके विपरीत, जो प्रक्रिया अपने आसपास ऊष्मा छोड़ती है, उसे उष्माक्षेपी (एक्सोथर्मिक) प्रक्रिया कहते हैं। पेट्रोल का जलना इसका परिचित उदाहरण है, जिसमें बड़ी मात्रा में ऊष्मा निकलती है। ‘हीट पैक’ भी इसी प्रकार की उष्माक्षेपी प्रक्रियाओं पर आधारित होते हैं। हालांकि, इनमें प्रतिक्रिया बहुत तेज नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे होती है, जिससे गर्माहट लंबे समय तक बनी रहती है।


हवा के संपर्क से सक्रिय होने वाले हीट पैक

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, ऐसे हीट पैक हवा के संपर्क में आते ही सक्रिय हो जाते हैं। इनमें लोहे की ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया यानी जंग लगने की प्रक्रिया होती है। जब कोई शुद्ध धातु हवा के संपर्क में आती है, तो वह ऑक्सीजन से प्रतिक्रिया करती है और इस दौरान ऊष्मा निकलती है। उदाहरण के लिए, जब एंगल ग्राइंडर स्टील टुकड़े से टकराता है तो चिंगारियां निकलती हैं। यदि ऐसा है, तो फिर धातु की वस्तुएं हर समय चिंगारियां क्यों नहीं छोड़तीं? दरअसल, लगभग सभी धातुओं की सतह पर ऑक्साइड की एक बेहद पतली परत बन जाती है, जो ऑक्सीजन के साथ उनकी प्रतिक्रिया की गति को धीमा कर देती है। यही कारण है कि लोहे के ठोस टुकड़े पर जंग बहुत धीरे-धीरे लगती है। लेकिन हीट पैक के लिए यह गति पर्याप्त नहीं होती। इसलिए इनमें लोहे के ठोस टुकड़े की जगह लोहे का बारीक पाउडर भरा जाता है। इससे लोहे का सतही क्षेत्रफल बढ़ जाता है और ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करने के लिए अधिक सतह उपलब्ध हो जाती है।


पुन: इस्तेमाल होने वाले हीट पैक

पुन: उपयोग किए जा सकने वाले ‘हीट पैक’ भी उष्माक्षेपी प्रक्रिया पर आधारित होते हैं, लेकिन इनमें प्रतिक्रिया यांत्रिक तरीके से शुरू होती है। ऐसे ‘हीट पैक’ में सोडियम एसीटेट नामक रंगहीन ठोस पदार्थ होता है, जो पानी में आसानी से घुल जाता है। यदि गर्म पानी में इसकी अधिकतम मात्रा घोलकर उसे सावधानी से ठंडा किया जाए, तो अतिसंतृप्त विलयन तैयार हो जाता है। यह तब तक स्थिर रह सकता है, जब तक उसे कोई हल्का यांत्रिक झटका न मिले। ‘हीट पैक’ के भीतर लगी छोटी धातु की पट्टी को मोड़ने या दबाने पर इतना झटका मिल जाता है कि सोडियम एसीटेट का क्रिस्टलीकरण शुरू हो जाता है। यह एक उष्माक्षेपी प्रक्रिया है, जिससे ऊष्मा निकलती है और पैक के भीतर मौजूद पानी गर्म हो जाता है।