अदालतों में बढ़ती सख्ती और फैसलों की गुणवत्ता पर सवाल
अदालतों में जजों की बढ़ती बोलचाल
कई साल पहले, प्रसिद्ध वकील एजी नूरानी ने 'फ्रंटलाइन' पत्रिका में 'टॉकिंग जजेज' शीर्षक से एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने बताया कि आजकल अदालतों में जजों की बातचीत की मात्रा बढ़ गई है। उनका मानना था कि जजों का मुख्य कार्य बोलना नहीं है। नूरानी ने यह भी कहा कि जजों की बढ़ती बातचीत के कारण उनके निर्णयों की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है। पहले के जजों के निर्णय नजीर बनते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। एजी नूरानी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन यदि होते, तो आज की अदालतों की स्थिति देखकर आश्चर्यचकित होते।
हाल के दिनों में एक नया ट्रेंड देखने को मिला है, जिसमें अदालतें सुनवाई के दौरान सख्त रुख अपनाती हैं। वे सरकार से तीखे सवाल पूछती हैं, लेकिन अंततः निर्णय अक्सर सरकार या सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही आते हैं।
उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल के ऋतब्रत मुखर्जी का मामला सामने आया है। विधानसभा के स्पीकर ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी, जबकि वे ममता बनर्जी की पार्टी से टूटे 60 विधायकों का नेतृत्व कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने इस निर्णय को हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कई तीखे सवाल पूछे, लेकिन अगले दिन निर्णय आया कि ऋतब्रत को नेता प्रतिपक्ष बनाना सही है।
इसी तरह, केंद्र सरकार द्वारा टेलीग्राम पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय पर अदालत ने सख्त सवाल उठाए, लेकिन अगले दिन के फैसले में कहा गया कि प्रतिबंध उचित है। एक अदालत ने यह भी कहा कि फुटपाथ पर चलना लोगों का मौलिक अधिकार है, जिस पर सोशल मीडिया पर कई मीम्स बन रहे हैं। लोग याद दिला रहे हैं कि जब बंगाल की मतदाता सूची से नाम कटने की बात आती है, तो सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी याद आती है कि फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार है, लेकिन वोट देने का क्या? यदि इस बार नहीं दिया, तो अगली बार दे देंगे।
