अल-नीनो का असर: महंगाई और कृषि पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल
महंगाई की नई लहर
नई दिल्ली: घरेलू रसोई में खर्चों में अचानक वृद्धि देखने को मिल रही है। चीनी का स्टॉक पहले से तेजी से खत्म हो रहा है और हरी सब्जियों की खरीदारी करते समय लोग बार-बार जेब में हाथ डाल रहे हैं। यह स्थिति अचानक महंगाई के बढ़ने का संकेत देती है, जिसका कारण भारत की सीमाओं से हजारों किलोमीटर दूर, प्रशांत महासागर में छिपा है। समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने की घटना, जिसे अल-नीनो कहा जाता है, अब देश की खाद्य अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौती बन गई है। यदि इसका प्रभाव व्यापक हुआ, तो फसलों की उत्पादन क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ेगा, जिससे मंडियों और खुदरा दुकानों में अनाज और सब्जियों की आपूर्ति में कमी आ सकती है।
आर्थिक विकास की चिंता
विकास दर पर भी टिकी नजर
इस आर्थिक उथल-पुथल के बीच, अर्थव्यवस्था की गति पर भी सवाल उठने लगे हैं। रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च ने चेतावनी दी है कि वित्त वर्ष 2026-27 में खाद्य और ईंधन की कीमतों में वृद्धि से आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी हो सकती है।
एजेंसी के अनुसार, जीडीपी वृद्धि दर घटकर लगभग 6.8% रह सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 7.6% थी। खुदरा महंगाई भी पिछले वर्ष के 2% से बढ़कर लगभग 4.9% तक पहुंचने की संभावना है।
कृषि पर प्रभाव
खेत से थाली तक बिगड़ता हिसाब
भारत में अधिकांश किसान आज भी सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर हैं, इसलिए अल-नीनो जैसी घटनाएं यहां गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती हैं। यदि बारिश कम या असमान होती है, तो फसल उत्पादन में कमी आएगी, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित होगी। खरीद से लेकर भंडारण, परिवहन और अंततः दुकानों तक पहुंचने में लागत बढ़ती जाएगी। मुख्य फसलों की कमी होने पर सरकार को आयात का सहारा लेना पड़ता है, जिससे न केवल आयात बिल बढ़ता है, बल्कि उपभोक्ता भी वैश्विक कीमतों के प्रभाव में आ जाते हैं। इंडिया रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 85 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बना रहता है, तो व्यापार घाटे पर कुछ नियंत्रण रखा जा सकता है, लेकिन खाद्य महंगाई इस राहत को बेअसर कर सकती है।
बुआई की स्थिति
बुआई का आंकड़ा फिलहाल राहत भरा
हालांकि, खेतों की स्थिति अभी इतनी चिंताजनक नहीं है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को बताया कि इस बार खरीफ फसलों पर अल-नीनो का कोई बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना कम है। 14 अगस्त तक देशभर में लगभग 1,016.57 लाख हेक्टेयर में बुआई पूरी हो चुकी थी, जो सामान्य दायरे का लगभग 92% है और पिछले वर्ष की तुलना में केवल 2% कम है। संवेदनशील जिलों की संख्या भी 262 से घटकर लगभग 100 रह गई है।
क्षेत्रीय असमानता
दक्षिण और पूर्वी हिस्सों में सूखे के आसार
हालांकि, देश के विभिन्न हिस्सों में स्थिति समान नहीं है। मौसम विभाग के अनुसार, अगस्त के मध्य तक मानसून की औसत कमी 12% रही, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में यह आंकड़ा 26%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 19% और उत्तर-पश्चिम भारत में 11% तक पहुंच गया। कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में पानी की कमी पहले से ही महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अल-नीनो का प्रभाव हमेशा समान नहीं होता; कहीं सूखे की स्थिति बनती है तो कहीं सामान्य बारिश भी होती है, और यही असंतुलन आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों को प्रभावित करेगा।
