आपातकाल: इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने कैसे बदली देश की दिशा
आपातकाल का काला दौर
आपातकाल का काला दौर
1975 में, जब देश के नागरिक गहरी नींद में थे, तब उन्हें यह नहीं पता था कि अगले दिन उनकी जिंदगी में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। 25 जून की रात, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की। इसके बाद से पूरे देश में राजनीतिक नेताओं और आम नागरिकों को गिरफ्तार किया जाने लगा। यह आपातकाल 21 महीनों तक चला।
इस अवधि में न केवल राजनीतिक दलों के अधिकारों का हनन हुआ, बल्कि आम लोगों के अधिकार भी सीमित कर दिए गए। 25 जून 1975 की रात को भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक विवादास्पद घटना के रूप में याद किया जाता है। आपातकाल के लागू होते ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई, और हजारों विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
आपातकाल की नींव रखने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को समझने के लिए हमें 1971 में लौटना होगा। उस समय, इंदिरा गांधी ने रायबरेली सीट से समाजवादी नेता राज नारायण को हराया था। हार के बाद, राज नारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें आरोप लगाया गया कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया।
लगभग चार साल की सुनवाई के बाद, 19 मार्च 1975 को इंदिरा गांधी अदालत में गवाही देने वाली पहली प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद, 12 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया, जिसके 13 दिन बाद आपातकाल की घोषणा की गई।
विपक्षी दलों का विरोध
फैसले के अगले दिन, विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति भवन की ओर मार्च किया और इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की। उनका तर्क था कि जब चुनाव अवैध घोषित हो चुका है, तो प्रधानमंत्री पद पर बने रहना नैतिक रूप से सही नहीं है।
इस बीच, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दिल्ली लाने का प्रयास किया, ताकि यह दिखाया जा सके कि पार्टी और जनता का एक बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री के साथ है। इस दौरान, इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के पुतले भी जलाए गए। अंततः, 25 जून की रात को इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की।
