इजराइल के चुनाव: नेतन्याहू की राजनीतिक परीक्षा और नई चुनौतियाँ
इजराइल के चुनाव का ऐतिहासिक क्षण
27 अक्टूबर 2026 को इजराइल में एक महत्वपूर्ण चुनाव हो रहा है, जिस पर वैश्विक ध्यान केंद्रित है। यह केवल एक साधारण चुनाव नहीं है, बल्कि बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती है। नेतन्याहू, जो संकट के समय में देश को संभालने का दावा करते हैं, अब एक जटिल राजनीतिक स्थिति में फंसे हुए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स यह संकेत दे रही हैं कि उनकी पार्टी भले ही सबसे बड़ी बनकर उभरे, लेकिन इजराइल के जटिल चुनावी समीकरणों के कारण सत्ता उनके हाथ से निकल सकती है। क्या इस बार इजराइल में नया इतिहास बनेगा या नेतन्याहू कोई नया समीकरण स्थापित करेंगे?
इजराइल का चुनावी ढांचा और भारत से भिन्नताएँ
इजराइल के चुनावी ढांचे को समझना आवश्यक है, जो भारत या अमेरिका से काफी भिन्न है। यहाँ जनता सीधे किसी प्रधानमंत्री को वोट नहीं देती, बल्कि पार्टियों को वोट देती है। इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं, और सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की आवश्यकता होती है। अब तक किसी भी पार्टी ने अकेले 61 सीटें नहीं जीती हैं, जिससे हमेशा गठबंधन सरकारें बनती हैं। नेतन्याहू इस गठबंधन के प्रमुख खिलाड़ी हैं, लेकिन इस बार दक्षिणपंथी वोट बैंक में दरार आ चुकी है।
नेतन्याहू की मुश्किलें और सेना में भर्ती का कानून
नेतन्याहू की सरकार को एक नए कानून ने हिला दिया है, जो सेना में भर्ती से संबंधित है। इजराइल में हर नागरिक को सेना में सेवा देनी होती है, लेकिन अतिरूढ़िवादी यहूदियों को इससे छूट मिली हुई थी। हाल के हमलों के बाद, सेना के प्रमुख ने कहा है कि अब और सैनिकों की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दिया है कि सभी को सेना में भर्ती होना पड़ेगा। इस पर इजराइली जनता में गुस्सा है, और 72% लोग चाहते हैं कि भर्ती का नियम सभी के लिए समान हो।
सर्वेक्षण और नेतन्याहू की स्थिति
दक्षिणपंथी नेता ऑफर विंटर ने कहा है कि वे चुनाव के बाद नेतन्याहू को प्रधानमंत्री बनाने की सिफारिश करेंगे, लेकिन जब तक सेना में भर्ती का कानून लागू नहीं होता, वे सरकार का हिस्सा नहीं बनेंगे। एक हालिया सर्वेक्षण में 48% इजराइली जनता ने कहा है कि पूर्व सेना प्रमुख गादी आयदन कोर्ट नेतन्याहू से बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे।
गाजा में संभावित बदलाव
गाजा में युद्ध, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का विस्तार और फिलिस्तीनियों के लिए अलग देश बनाने का मुद्दा लंबे समय से विवाद का कारण बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विपक्षी नेता सत्ता में आते हैं, तो कुछ मामलों में स्थिति संभालने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, फिलिस्तीन को अलग देश बनाने के सवाल पर बड़े बदलाव की संभावना कम है। नए प्रधानमंत्री के आने पर सैन्य कार्रवाई के तरीके में बदलाव हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तनाव समाप्त हो जाएगा।
