उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का समाजवादी पार्टी के प्रति समर्थन
मुस्लिम मतदाताओं का स्पष्ट रुख
उत्तर प्रदेश के मुस्लिम समुदाय में कोई संदेह नहीं है। वे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा दिखा रहे हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि सपा इस बार भाजपा के खिलाफ मुख्य प्रतिद्वंद्वी है। पिछले लोकसभा चुनाव में, उन्होंने देखा कि भाजपा के समर्थक भी यदि असंतुष्ट होते हैं, तो वे सपा के साथ मिलकर भाजपा को हराने का प्रयास करते हैं। संविधान और आरक्षण के मुद्दों पर असंतोषित वर्ग ने भाजपा को हराने के लिए सपा का समर्थन किया, जिससे सपा ने लोकसभा में 37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनने में सफलता पाई। इस गठबंधन का लाभ कांग्रेस को भी मिला।
कांग्रेस की रणनीतियाँ
हालांकि, कांग्रेस के नेता इस प्रयास में लगे हैं कि किसी तरह से समाजवादी पार्टी में यह संदेह पैदा किया जाए कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस की ओर आकर्षित हो सकते हैं। इसका उद्देश्य विधानसभा चुनाव में अधिक सीटें हासिल करना है। लेकिन सपा को सच्चाई का पता है। जब मुस्लिम मतदाता लोकसभा चुनाव में सपा के साथ थे, तो विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस के साथ क्यों जाएंगे? फिर भी, सपा इस खेल में शामिल है। हाल ही में, सपा ने कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के दामाद को अपनी पार्टी में शामिल किया। इसके जवाब में, कांग्रेस ने बसपा और एमआईएम के कई मुस्लिम नेताओं को अपने दल में शामिल किया है।
नए सदस्य और गठबंधन
कांग्रेस में एमआईएम के प्रमुख नेता आसिम वकार हाल ही में शामिल हुए हैं। इसके अलावा, बसपा सरकार में मंत्री रहे इजहारुल हक और 2024 में लोकसभा चुनाव में बसपा की टिकट पर लड़ने वाले नईम अहमद को भी पार्टी में शामिल किया गया है। इससे पहले, पूर्व सांसद आमिर आलम खान और उनके बेटे नवाजिश आलम खान भी कांग्रेस में शामिल हुए थे। नवाजिश पहले विधायक रह चुके हैं और दोनों पिता-पुत्र कई पार्टियों में रह चुके हैं। आमिर आलम रालोद से कैराना के सांसद रह चुके हैं।
