कांग्रेस की चुनौतियाँ: चमकते चेहरों की राजनीति और संगठन की कमी
कांग्रेस का विपक्ष में लंबा सफर
कांग्रेस पार्टी ने कभी भी विपक्ष में इतना लंबा समय नहीं बिताया है। वर्तमान में, यह विपक्ष में रहने का समय लगातार बढ़ता जा रहा है। 1977 में पहली बार हारने के बाद, वह केवल ढाई साल तक सत्ता से बाहर रही थी। 1989 में हारने के बाद, वह लगभग दो साल तक सत्ता से बाहर रही। 1996 में हारने पर, वह करीब आठ साल तक सत्ता से बाहर रही, लेकिन इस बार यह अवधि 12.5 साल हो चुकी है और कम से कम 15 साल तक उसे सत्ता से बाहर रहना होगा। इसका मतलब है कि पहले तीन बार में जितना समय कांग्रेस ने सत्ता से बाहर बिताया, उससे अधिक समय अब एक बार में हो गया है। इस स्थिति ने कांग्रेस के प्रति विश्वास रखने वाले नेताओं के मन में संदेह पैदा कर दिया है।
कांग्रेस की आंतरिक समस्याएँ
कांग्रेस के वर्तमान हालात अच्छे नहीं हैं, जिसके कारण उसके हर कदम को गलत समझा जा रहा है। पार्टी के भीतर एक प्रवृत्ति रही है कि वह चमकते चेहरों के पीछे भागती है, बजाय इसके कि संगठन और विचार पर ध्यान दे। यह केवल वंशवाद का मामला नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक प्रवृत्ति है। आमतौर पर कमजोर संगठन ऐसे ही कार्य करते हैं। यदि कोई पार्टी विचार और संगठन के स्तर पर मजबूत है, तो चेहरों की अहमियत सीमित होती है।
नेता और चमकते चेहरे
कांग्रेस में हमेशा से यह अनुपात बिगड़ा रहा है। उसकी विचारधारा, संगठन और नेतृत्व सभी आजादी के समय के हैं। पार्टी ने इन तीनों में से किसी पर भी अलग से ध्यान नहीं दिया। नेहरू-गांधी परिवार के अलावा, कांग्रेस हमेशा किसी चमकते चेहरे की तलाश में रहती है। जैसे राजीव गांधी ने अमिताभ बच्चन और माधवराव सिंधिया को आगे बढ़ाया था। राहुल गांधी के नेतृत्व में, पार्टी ने कई युवा नेताओं को मौका दिया, लेकिन उनमें से अधिकांश ने पार्टी छोड़ दी।
नेहा बोरा का उदय
हाल ही में, कांग्रेस ने नेहा बोरा को प्रमोट करने का निर्णय लिया है। कुछ समय पहले कन्हैया कुमार को भी प्रमोट किया गया था। कन्हैया कुमार जेएनयू में एक प्रोटेस्ट के बाद उभरे थे और अब वे कांग्रेस की सीबीडब्लूसी के सदस्य बन गए हैं। उन्होंने दो बार लोकसभा चुनाव भी लड़ा।
चमकते चेहरों का प्रभाव
कांग्रेस ने कुछ साल पहले गुजरात में तीन नेताओं को भी प्रमोट किया था, लेकिन वे सभी अब पार्टी छोड़ चुके हैं। ऐसे चमकते चेहरे अक्सर व्यावहारिक राजनीति के प्रशिक्षण से नहीं गुजरे होते हैं, जिससे पार्टी का नैरेटिव प्रभावित होता है। कन्हैया के कारण कांग्रेस पर 'टुकड़े टुकड़े गैंग' का टैग लगा है। कांग्रेस को चाहिए कि वह बाहरी चेहरों की बजाय अपने संगठन और विचारधारा पर ध्यान दे।
