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कांग्रेस की सीटों की मांग: क्या है असली वजह?

कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर 180 सीटों की मांग कर रही है, लेकिन इस मांग का कोई ठोस आधार नहीं है। पार्टी के नेता राहुल गांधी के योगदान को लेकर सवाल उठा रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा की जीत में कांग्रेस का योगदान सीमित रहा है। इस लेख में कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति, उसकी रणनीतियों और संभावित परिणामों पर चर्चा की गई है। क्या कांग्रेस अपनी ताकत को सही तरीके से आंक रही है? जानें इस लेख में।
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कांग्रेस की स्थिति पर सवाल


कांग्रेस पार्टी के नेता उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर 180 सीटों की मांग कर रहे हैं, जबकि कुछ ने तो 200 सीटों की भी मांग की है। हालांकि, इस मांग का कोई ठोस आधार नहीं है। कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम का कहना है कि राहुल गांधी के योगदान के कारण सपा को जीत मिली थी, इसलिए कांग्रेस को अधिक सीटें चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि अगर राहुल गांधी के योगदान से सपा जीती, तो कांग्रेस खुद क्यों नहीं जीत पाई?


2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने 63 सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटें जीतीं, जिससे उसका स्ट्राइक रेट 60 प्रतिशत रहा। वहीं, कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 6 सीटें जीतीं, जिसका स्ट्राइक रेट 35 प्रतिशत रहा। यदि राहुल गांधी के कारण सपा जीत रही थी, तो कांग्रेस का स्ट्राइक रेट भी 60 प्रतिशत के आसपास होना चाहिए था।


यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन की जीत में कांग्रेस का योगदान सीमित था। इस जीत में संविधान और आरक्षण की रक्षा का नैरेटिव, भाजपा के खिलाफ माहौल, सपा की संगठनात्मक ताकत और टिकट वितरण का महत्वपूर्ण योगदान था। कांग्रेस को अपनी ताकत का आकलन 2022 के विधानसभा चुनाव से करना चाहिए, जहां उसे केवल 2.33 प्रतिशत वोट और दो सीटें मिली थीं।


सपा ने रालोद और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ मिलकर 111 सीटें जीतीं और उसे 32 प्रतिशत से अधिक वोट मिले। 2017 में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सपा को केवल 47 सीटें मिली थीं। 2019 में कांग्रेस और सपा अलग-अलग लड़े, जिसमें कांग्रेस को केवल एक सीट मिली।


कांग्रेस को अपनी वास्तविक ताकत का आकलन 2017, 2019 और 2022 के चुनावों से करना चाहिए। लेकिन वह 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों की एकतरफा व्याख्या कर रही है। कांग्रेस को लगता है कि दलित और मुस्लिम मतदाताओं में उसकी पैठ बढ़ी है और वह इनका वोट ट्रांसफर कर सकती है।


कांग्रेस के नेता मानते हैं कि सपा के पास केवल 10 प्रतिशत यादव वोट है, जबकि 40 प्रतिशत मुस्लिम और दलित वोट है, जिसका रुझान कांग्रेस की ओर है। हालांकि, मुस्लिम मतदाता अभी भी सपा के साथ हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि सपा के पास एक अतिरिक्त वोट है। कांग्रेस 180 सीटों का दबाव बना रही है ताकि वह मोलभाव कर सके और अधिक सीटें हासिल कर सके।


कांग्रेस के कई नेता मानते हैं कि भाजपा के सांसद परिमल नाथवानी के बेटे को राज्यसभा टिकट देने के मामले में सपा को एक्सपोज करके, कांग्रेस अकेले लड़कर मुस्लिम और दलित वोट के साथ-साथ ब्राह्मण वोट भी अपने साथ जोड़ सकती है। लेकिन अगर यह फॉर्मूला काम नहीं करता है, तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है।


कांग्रेस की यह रणनीति विपक्ष के अन्य दलों की स्थिति को कमजोर करने के लिए भी है। वह चाहती है कि सपा की स्थिति भी तृणमूल कांग्रेस, राजद और आम आदमी पार्टी जैसी हो, जो चुनाव हारने के बाद कमजोर हो गई हैं।


राहुल गांधी की स्थिति को लेकर विपक्ष में केवल दो नेता हैं जो उनकी बराबरी में बात कर सकते हैं: अखिलेश यादव और हेमंत सोरेन। हेमंत सोरेन ने झारखंड में एक मजबूत वोट आधार बना लिया है। उत्तर प्रदेश में सपा ने 2022 में 111 विधानसभा सीटें और 2024 में 37 लोकसभा सीटें जीती हैं।


कांग्रेस विधानसभा चुनाव में अधिक सीटों की मांग कर रही है ताकि अगर गठबंधन जीते, तो उसके पास इतनी सीटें हों कि सपा की सरकार बिना कांग्रेस के न बन सके। कांग्रेस का दूसरा उद्देश्य लोकसभा चुनाव में अधिक सीटें लेना है।