कांग्रेस ने पंजाब में विवाद सुलझाने की कोशिश की, चन्नी की भूमिका महत्वपूर्ण
पंजाब में कांग्रेस की स्थिति
कांग्रेस ने पंजाब में अपने विवाद को कुछ हद तक सुलझा लिया है। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष चरणजीत सिंह चन्नी के विरोधियों को अगर ज्यादा उत्तेजित किया गया या जीत का जश्न मनाया गया, तो इससे कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। यह सच है कि चन्नी ने एक बड़ा दांव खेला था। उनका इरादा था कि उन्हें या तो प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए या मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया जाए। लेकिन कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं थी, क्योंकि चन्नी के मुख्यमंत्री रहते हुए पार्टी ने पिछला चुनाव लड़ा था और केवल 18 सीटें जीती थीं। चन्नी खुद अपनी दोनों सीटों पर हार गए थे और इसके बाद वे अमेरिका चले गए थे, जहां से वे नौ महीने बाद लौटे। लौटने के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ाया, जिसमें वे जीत गए और कृषि मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष बने।
चन्नी की राजनीतिक स्थिति
चुनाव लड़ने का खतरा यह था कि जाट सिख वोट पिछली बार की तरह फिर से टूट सकता था। इसलिए अमरिंदर सिंह राजा वारिंग को अध्यक्ष बनाए रखा गया है। फिर भी, कांग्रेस को चन्नी को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। वे दलित समुदाय के प्रमुख नेता हैं और मजहबी दलितों में उनकी अच्छी पकड़ है। कांग्रेस को हरियाणा के अनुभव को ध्यान में रखना चाहिए, जहां उसने भूपेंदर सिंह हुड्डा पर पूरा दांव लगाया था, जिससे कुमारी शैलजा नाराज होकर घर बैठ गई थीं। उस समय जाट और दलित का समीकरण काम नहीं कर पाया। यदि चन्नी भी नाराज होकर घर बैठ गए या दलितों में यह संदेश गया कि वे नाराज हैं, तो कांग्रेस को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। कांग्रेस नेतृत्व को यह भी पता है कि जालंधर सहित दोआबा क्षेत्र में चन्नी की स्थिति मजबूत है। ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव की तैयारियों के लिए जालंधर में पहला कार्यक्रम किया था। भाजपा की नजर भी दलित वोटों पर है।
