क्या POCSO एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है? सुप्रीम कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण सवाल
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई को POCSO अधिनियम के उपयोग पर फिर से सवाल उठाए। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि 15 से 18 वर्ष के किशोर आपसी सहमति से रिश्ते बनाते हैं और कई बार घर से भाग जाते हैं। ऐसे मामलों में, माता-पिता अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए POCSO अधिनियम के तहत मामले दर्ज कराते हैं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या सरकार किशोरों को भागने से रोकने के लिए कुछ कर सकती है? क्या हर सहमति से बना रिश्ता POCSO का मामला बनता है?
कोर्ट की टिप्पणियाँ
बेंच ने कहा, "POCSO अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण और उत्पीड़न से बचाना है। 15 से 18 वर्ष की आयु संवेदनशील होती है, और यह नई चीजें आजमाने का समय है। क्या हर रिश्ते को आपराधिक मामला बनाना उचित है?" कोर्ट ने यह भी कहा कि इस उम्र में बच्चे रिश्ते बनाते हैं और घर छोड़ देते हैं, जिसके बाद हमें उन मामलों में लोगों को बरी करना पड़ता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह सुनवाई किशोरों के निजता के अधिकार से संबंधित एक स्वतः संज्ञान मामले में हुई। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट के उस विवादास्पद निर्णय के बाद शुरू हुआ था, जिसमें लड़कियों को "दो मिनट के सुख" के लिए रिश्तों में न उलझने और अपनी यौन इच्छाओं पर "काबू" रखने की सलाह दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही उस टिप्पणी को खारिज कर चुका है। सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने बताया कि यह मामला एक नाबालिग लड़की के 25 वर्षीय युवक के साथ भागने से शुरू हुआ था। अब वह अपने पति के साथ रह रही है और उनका एक बच्चा भी है।
सिस्टम में सुधार की आवश्यकता
कोर्ट ने इस मामले में एक समिति का गठन किया था। सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट में POCSO मामलों में प्रणाली की खामियों का उल्लेख किया गया था। दीवान ने कहा कि POCSO के तहत नाबालिगों को पुनर्वास और सहायता का अधिकार है, लेकिन हर मामले में जेल भेजना समाधान नहीं है।
सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने पूछा कि क्या यह भागने का मामला था या अपहरण का। दीवान ने कहा कि लड़की अपनी मर्जी से गई थी। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी स्थितियों को रोकने के लिए एक प्रणाली की आवश्यकता है।
केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि वह कक्षा 6 से POCSO और यौन शिक्षा पर जागरूकता लाने का प्रस्ताव ला रही है। इसका उद्देश्य बच्चों को कानून, सुरक्षा और उनके अधिकारों की सही जानकारी देना है।
सरकार का कहना है कि कम उम्र में संवेदनशीलता लाना आवश्यक है, ताकि 17-18 वर्ष के युवाओं को हर छोटे मामले में जेल न जाना पड़े। अब कोर्ट ने केंद्र के सुझावों पर आगे की कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
