क्या भारत में 11.83 करोड़ मतदाता सूची से बाहर? जानें इसके पीछे की सच्चाई
मतदाता सूची में भारी गिरावट
नई दिल्ली: यदि किसी राज्य की पूरी जनसंख्या के बराबर लोग अचानक मतदाता सूची से हटा दिए जाएं, तो यह केवल एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं रह जाता। वर्तमान में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) के तहत लगभग 11.83 करोड़ नाम हटा दिए गए हैं, जो कि देश के कुल पंजीकृत मतदाताओं का लगभग 12.1 प्रतिशत है। तुलना के लिए, 2022 में ब्राजील के आम चुनाव में भी इतने वोट नहीं पड़े थे, और भारत-चीन को छोड़कर, केवल चौदह देश हैं जिनकी जनसंख्या दस करोड़ से अधिक है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सरकार और विपक्ष के दृष्टिकोण
विपक्ष का कहना है कि प्रशासनिक लापरवाही के कारण लाखों वास्तविक मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। वहीं, सरकार और उसके समर्थक यह तर्क करते हैं कि मृत, स्थायी रूप से पलायन कर चुके और फर्जी मतदाताओं को हटाना आवश्यक था। वर्तमान में, 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट रोल जारी किया गया है, जहां नाम कटने की दर 17 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
संशोधन के बाद की स्थिति
जहां प्रक्रिया पूरी हुई, वहां का हिसाब कुछ नरम
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे आठ राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यहां चौंतीस करोड़ एक लाख मतदाताओं में से मसौदा सूची में उनतीस करोड़ पच्चीस लाख नाम ही बने रहे, लेकिन अंतिम सूची में यह संख्या बढ़कर तीस करोड़ छत्तीस लाख हो गई। कुल मिलाकर गिरावट सिमटकर साढ़े दस प्रतिशत के आसपास रह गई। वहीं, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में संशोधन के बाद चुनाव कराने पर अंतिम गिरावट महज 8.1 प्रतिशत दर्ज की गई।
मतदान पर प्रभाव और न्यायालय की भूमिका
मतदान पर असर और अदालत की दहलीज
दिलचस्प बात यह है कि जिन राज्यों में संशोधन के बाद मतदान हुआ, वहां कुल मतदान में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई। बल्कि, सूची छोटी होने के कारण मतदान प्रतिशत में वृद्धि देखी गई। हालांकि, कागजी औपचारिकताओं और जटिल सत्यापन ने कई वास्तविक मतदाताओं के लिए समस्याएं उत्पन्न की हैं। पश्चिम बंगाल इस मामले में सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है, जहां लगभग सत्ताईस लाख लोग गलत तरीके से नाम हटाए जाने के आरोप के साथ अदालत का दरवाजा खटखटा चुके हैं।
