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क्या मोदी-शाह का सूरज ढल रहा है? अंबानी और अडानी की स्थिति पर विचार

क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह का शासन जनता की नजरों में ढल रहा है? इस लेख में हम अंबानी और अडानी की स्थिति पर विचार करते हैं और यह देखते हैं कि क्या वे अभी भी मोदी की बिसात के मोहरे हैं या नए दांव के साथ अपनी नई बिसात बिछा रहे हैं। जानें राजनीतिक परिदृश्य में संभावित बदलाव और उद्योगपतियों की ताकत के बारे में।
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राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव


एक साधारण सवाल है: क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह की उम्र रिलायंस और अडानी समूह की उम्र से अधिक है? चुनावों को छोड़कर, क्या मोदी-शाह का शासन जनता की नजरों में ढल रहा है? कितने और साल वे सत्ता में रहेंगे? क्या वे और लोगों को बर्बाद या बना सकते हैं? क्या भविष्य में मोदी-शाह और उनके सहयोगियों को कटघरे में खड़ा होने का मौका नहीं मिलेगा? लेकिन क्या मुकेश अंबानी और गौतम अडानी का भी समय ढल रहा है? मुझे नहीं लगता। इन दोनों उद्योगपतियों की ताकत भारत की सत्ता, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका को खरीदने की क्षमता में है।


भारत के इतिहास में, हर युग में व्यापारियों ने दरबारों को प्रभावित किया है। चाहे वह गांधी हों या इंदिरा गांधी, सभी ने धीरूभाई अंबानी और गौतम अडानी जैसे उद्योगपतियों के प्रति कृतज्ञता दिखाई है।


भारत के धन्नासेठ इतने मूर्ख नहीं हैं कि वे ढलती सत्ता के साथ अपनी रात भी बना लें। गौतम अडानी ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से घंटों बातचीत की है, जो एक महत्वपूर्ण संकेत है। मुकेश अंबानी के प्रमुख प्रबंधक परिमल नाथवानी ने अपने बेटे धनराज नाथवानी को अखिलेश यादव के लिए राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है।


इसका मतलब है कि विपक्ष में राहुल, प्रियंका, खड़गे और अन्य नेताओं की संभावनाएं बढ़ रही हैं। परिमल का उम्मीदवार बनना भी बहुत कुछ दर्शाता है।


गौतम अडानी और मुकेश अंबानी ने मोदी और शाह को यह संदेश दिया है कि वे विपक्ष में प्रवेश कर रहे हैं। क्या मोदी-शाह ने जानबूझकर अंबानी-अडानी के माध्यम से विपक्ष में विभीषण पैदा करने की योजना बनाई है? यह 2024 के चुनावों के लिए एक रणनीति हो सकती है।


हालांकि, समय बड़ा बलवान है। क्या हम 2025 के ऑपरेशन सिंदूर से लेकर 2026 तक के 16 महीनों का लेखा-जोखा नहीं देख सकते? यह रावण के अंतिम समय की पटकथा की तरह प्रतीत होता है। समय का यह सत्य हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल व्यक्तियों की घोषणाओं से नहीं, बल्कि समाज पर उनके वास्तविक प्रभाव से लिखा जाता है।


क्या कोई समझदार यह मान सकता है कि अंबानी और अडानी अभी भी मोदी की बिसात के मोहरे हैं? या वे अब नए घोड़ों और नए दांव के साथ अपनी नई बिसात बिछा रहे हैं?