क्या 'वोट चोरी' आंदोलन भी गतिरोध का शिकार होगा?
वोट चोरी आंदोलन की चुनौतियाँ
वोट चोरी के खिलाफ चल रहा आंदोलन भी उसी तरह की समस्याओं का सामना कर सकता है, जैसे नरेंद्र मोदी के शासन में अन्य आंदोलनों को झेलना पड़ा है। मोदी सरकार की यह विशेषता रही है कि वह असहमत समूहों की मांगों का समाधान नहीं करती, जिसके परिणामस्वरूप कई आंदोलन ठप हो जाते हैं।
भारत में चुनावों में धांधली के आरोपों के कई पहलू हैं, लेकिन आमतौर पर इसे 'वोट चोरी' के रूप में जाना जाता है। जब इस शब्द का प्रयोग होता है, तो इसमें निर्वाचन आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव, चुनाव कार्यक्रमों में पक्षपात, और मतदान के दिन प्रशासन का एकतरफा रुख शामिल होता है। इसके अलावा, मतदाता सूची में नामों को जोड़ने या काटने के आरोप भी इस संदर्भ में उठते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के प्रति अविश्वास भी एक गंभीर मुद्दा है। खासकर, वीवीपैट पर्चियों की गणना और ईवीएम के सॉफ्टवेयर को विपक्ष के साथ साझा करने में निर्वाचन आयोग का जिद्दी रुख इसे और बढ़ा देता है।
सितंबर में एक प्रमुख समाचार पत्र ने एसआईआर के संबंध में निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेदों की रिपोर्ट की, जिसके बाद 'वोट चोरी' एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन गया। अक्टूबर के पहले दो हफ्तों में, यह आंदोलन राजनीतिक गोलबंदी को प्रेरित करता दिखाई दिया।
हालांकि, यह आंदोलन राजनीतिक संगठनों और युवा समूहों तक सीमित रह गया है। इसका समर्थन उन लोगों ने किया है जो राजनीतिक रूप से जागरूक हैं, लेकिन यह आम जनता को उतना प्रभावित नहीं कर पाया।
इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि 'वोट चोरी' का मुद्दा आम जन को उतना नहीं छूता, जितना कि नीट पेपर लीक का मामला। राजनीतिक विश्लेषक अजय गुडावर्ती ने इस पर सवाल उठाया है कि क्या 13 करोड़ लोगों के नाम काटे जाने के बावजूद वे केवल संख्या हैं या वास्तविक नागरिक।
यदि विपक्ष उन लोगों को गोलबंद करने में सफल होता, तो यह आंदोलन और भी मजबूत हो सकता था। लेकिन वर्तमान में, यह आंदोलन केवल राजनीतिक दलों के बीच का मुद्दा बनकर रह गया है।
इसलिए, यह संभावना कम है कि चुनाव प्रणाली और निर्वाचन आयोग की घटती साख से उत्पन्न समस्याओं का कोई समाधान निकलेगा। इसके बजाय, 'वोट चोरी' के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध बढ़ता जाएगा।
जब तक विपक्ष इसे एक गंभीर मुद्दा नहीं बनाता, तब तक इस गतिरोध के जारी रहने की संभावना है। चुनाव बहिष्कार का निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, लेकिन इससे संबंधित दलों के लिए नई चुनौतियाँ भी उत्पन्न हो सकती हैं।
इसलिए, 'वोट चोरी' आंदोलन का भविष्य अनिश्चित है, और यह संविधान बचाओ मुहिम की तरह ही ठप हो सकता है।
