क्या हैं 'दिमागी नक्सली' शब्द के पीछे की सच्चाई? पीएम मोदी के बयान पर सियासी घमासान
नई दिल्ली में सियासी हलचल
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर दिए गए भाषण में 'दिमागी माओवादी' शब्द का उपयोग करने के बाद से देश की राजनीति में हलचल मच गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने रविवार को इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने किसी विपक्षी नेता को नक्सली मानसिकता का नहीं कहा। उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किए गए पोस्ट में बताया कि इस श्रेणी में वे लोग शामिल हैं जो माओवाद का समर्थन करते हैं, संविधान का उल्लंघन करते हैं, अनुच्छेद 370 की बहाली की वकालत करते हैं और देश की अखंडता को चुनौती देने वाले 'चिकन्स नेक' कॉरिडोर को अलग करने की मंशा रखते हैं।
पीएम मोदी का भाषण और उसकी व्याख्या
यह विवाद तब शुरू हुआ जब पीएम मोदी ने शनिवार को लाल किले से अपने संबोधन में शहीद जवानों के बलिदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि देश को हथियारबंद नक्सलवाद से काफी हद तक मुक्त कर दिया गया है, लेकिन 'दिमागी नक्सली' अब भी समाज के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय हैं।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और बहस का नया दौर
पीएम मोदी ने यह भी कहा कि कई दशकों तक माओवादी सोच का प्रभाव सार्वजनिक जीवन और सरकारी समितियों में रहा है। जबकि हथियारबंद नक्सली समाप्त हो गए हैं, यह सोच युवाओं को भटकाने की कोशिश करती है, जिसे पहचानना और अलग करना आवश्यक है। रिजिजू ने फिर से स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री ने किसी विपक्षी नेता को नक्सली मानसिकता का नहीं कहा। इस बयान के तुरंत बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार पर हमला किया।
सीनियर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस बयान को खोखली राजनीति करार दिया और कहा कि 'दिमागी नक्सली' जैसे शब्दों का कोई वास्तविक आधार नहीं है। उनका आरोप है कि सरकार ऐसे बयानों के माध्यम से वैचारिक मतभेद रखने वालों को निशाना बना रही है। रिजिजू की टिप्पणी ने इस बहस को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
