चुनाव आयोग की उपचुनावों में असमानता पर उठे सवाल
चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना चुनाव आयोग का मुख्य कार्य है। हाल के दिनों में इस कार्य में कई गड़बड़ियां सामने आई हैं, जिससे सवाल उठ रहे हैं। चुनाव आयोग ने हाल ही में तीन राज्यों की विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा की है, लेकिन अन्य राज्यों में उपचुनावों के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया गया है। यह सोचने वाली बात है कि आयोग को लोकसभा और विधानसभा की हजारों सीटों के चुनाव एक साथ कराने हैं, फिर भी वह पांच राज्यों में उपचुनाव नहीं करा पा रहा है।
चुनाव आयोग ने बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात के मंजलपुर सीट पर उपचुनाव की घोषणा की है। इन सीटों पर नामांकन प्रक्रिया छह जून से शुरू हो चुकी है, जबकि वोटिंग 30 जून को होगी और परिणाम तीन अगस्त को घोषित किए जाएंगे। इनमें से एक सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की है, जिन्होंने राज्यसभा सदस्य बनने के बाद इस्तीफा दिया था। दूसरी सीट कांग्रेस के राजेंद्र भारती की है, जो एक मामले में सजा के बाद खाली हुई है। तीसरी सीट गुजरात की है, जो भाजपा विधायक के निधन के कारण खाली हुई।
हालांकि, मई में पश्चिम बंगाल की दो सीटें भी खाली हुई हैं, लेकिन चुनाव आयोग ने इन पर उपचुनाव की घोषणा नहीं की। इसी तरह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने भी एक सीट से इस्तीफा दिया है, लेकिन वहां भी उपचुनाव नहीं हो रहा है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग भाजपा को लाभ पहुंचाने के लिए ऐसे निर्णय ले रहा है।
विशेष रूप से, बांकीपुर सीट पर जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर की गतिविधियों से भाजपा चिंतित है। भाजपा को लगता है कि यदि प्रशांत किशोर को अधिक समय मिला, तो वे वहां भाजपा के खिलाफ माहौल बना सकते हैं। इसलिए, बांकीपुर सीट पर उपचुनाव की घोषणा जल्दी की गई है। आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को लेकर लोगों के बीच प्रचार कर रही है।
