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चुनाव आयोग ने SIR पर मतभेद की खबरों को किया खारिज

भारत में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया पर मतभेद की खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच असहमति की रिपोर्टों के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर चिंता जताई है।
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राजनीतिक बहस का केंद्र बना मतदाता सूची का पुनरीक्षण

नई दिल्ली: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर देश के विभिन्न राज्यों में राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। चुनाव आयोग के भीतर SIR प्रक्रिया को लेकर कथित मतभेदों की खबरों के बाद सियासी हलचल बढ़ गई है। रिपोर्टों में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्तों के बीच SIR से संबंधित कुछ निर्णयों पर असहमति थी। यह भी बताया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई बैठकों में प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर आपत्ति जताई।


हालांकि, भारत निर्वाचन आयोग ने इन दावों को खारिज कर दिया है। आयोग के सूत्रों के अनुसार, SIR सहित सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं और आयोग में किसी प्रकार का मतभेद नहीं है।


आयोग के सूत्रों ने बुधवार को कहा कि SIR समेत सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की मंजूरी से सभी निर्णय किए गए हैं।


सूत्रों के अनुसार, किसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की व्यक्तिगत राय भिन्न हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग के निर्णयों में मतभेद है। उन्होंने कहा कि SIR सहित सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।


इससे पहले एक रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई निर्णयों पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं।


इन आपत्तियों में SIR के अलावा फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, मतदाता संबंधी निर्णयों के खिलाफ अपील तथा चुनावी डेटा तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल थे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में सवाल उठाया कि उनकी जानकारी या सहमति के बिना निर्णय कैसे लिए गए। इन आपत्तियों की जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी दी गई थी।


रिपोर्ट के प्रकाश में आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की मांग की। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग को अपनी मर्जी से चला रहे हैं। पार्टी ने कहा कि सामने आई शिकायतों से यह स्पष्ट होता है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में केवल ज्ञानेश कुमार की ही चल रही है।


कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर काम करने का आरोप भी लगाया और 'वोट चोरी' तथा चुनाव आयोग में राजनीतिक दखलंदाजी से जुड़े अपने पुराने आरोप दोहराए।


समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने भी रिपोर्ट को गंभीर बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्त अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर पा रहे हैं।


अखिलेश यादव ने कहा, “इसका सीधा मतलब है कि सभी चुनाव आयुक्त अपने सही कर्तव्यों का पालन नहीं कर पा रहे हैं। अगर किसी स्वतंत्र संस्था के सदस्यों को सही काम करने की आजादी नहीं है या उनकी बात नहीं सुनी जाती है, तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं।”


इसके अलावा, शिवसेना (UBT) के संजय राउत, DMK के टीकेएस एलंगोवन, आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज और CPI(M) के जॉन ब्रिटास समेत कई अन्य विपक्षी नेताओं ने भी SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए।


वहीं, चुनाव आयोग ने अपने सूत्रों के माध्यम से स्पष्ट किया है कि आयोग के भीतर किसी प्रकार का संस्थागत मतभेद नहीं है और SIR सहित सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए हैं।