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जम्मू-कश्मीर सरकार की स्थिरता पर उठे सवाल

जम्मू-कश्मीर की सरकार की स्थिरता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के 41 विधायकों के समर्थन के बावजूद, पार्टी के भीतर बगावत ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। 24 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को अल्टीमेटम दिया है, जिससे सरकार की स्थिरता पर खतरा मंडरा रहा है। क्या भाजपा इस स्थिति का लाभ उठाएगी? जानिए पूरी कहानी में।
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क्या जम्मू-कश्मीर की सरकार संकट में है?


जम्मू-कश्मीर की सरकार की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन पहली नजर में ऐसा नहीं लगता। नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 41 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के छह और निर्दलीय छह विधायकों के साथ मिलकर सरकार के पास कुल 54 विधायकों का समर्थन है। दूसरी ओर, भाजपा के पास 30 विधायक हैं। राज्य में बहुमत के लिए 46 विधायकों की आवश्यकता है। उमर अब्दुल्ला की सरकार अपने दम पर नहीं चल रही है, लेकिन उसे ऐसे दलों का समर्थन प्राप्त है जो भाजपा के साथ नहीं जा सकते। फिर भी, उनकी पार्टी के 24 विधायकों की बगावत ने सरकार की स्थिरता पर सवाल खड़ा कर दिया है।


उमर की पार्टी के लोकसभा सांसद आगा रूहुल्ला मेहंदी ने श्रीनगर सीट से इस्तीफा दे दिया है और पार्टी छोड़ दी है। इसके अलावा, 24 विधायक नाराज हैं और उन्होंने पार्टी को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया है कि या तो चार नए मंत्रियों को हटाया जाए, अन्यथा वे अलग गुट बना लेंगे। हालांकि, स्पीकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के हैं, जिससे सरकार को कुछ राहत मिली है। लेकिन अगर भाजपा इस गुट के किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाने के लिए समर्थन देती है, तो स्थिति क्या होगी? भाजपा अपने मुख्यमंत्री को बनाना चाहती है, लेकिन घाटी का कोई विधायक नेशनल कॉन्फ्रेंस से कितना भी नाराज हो, वह भाजपा का सीएम बनाने के लिए समर्थन नहीं दे सकता। इसलिए भाजपा को दूसरा रास्ता अपनाना पड़ सकता है। तीसरा विकल्प यह है कि यदि विधायक दल में टूट होती है, तो राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है।