ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का गतिरोध: क्या होगा आगे?
ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा: एक जटिल स्थिति
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मामले में उत्पन्न गतिरोध को समाप्त करने का सवाल सभी के सामने है। केंद्र सरकार किसी भी स्थिति में उनके इस्तीफे की मांग नहीं कर सकती, और न ही कोई अन्य संस्था उन्हें हटा सकती है। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का एकमात्र तरीका संसद में महाभियोग लाना है। विपक्ष इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है, लेकिन सभी को पता है कि वे दो तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर पाएंगे। वर्तमान में, सरकार के पास भी यह बहुमत नहीं है।
इसलिए, ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा देने का एकमात्र विकल्प है। यदि वे इस्तीफा नहीं देते हैं, तो न तो सुप्रीम कोर्ट और न ही राष्ट्रपति उन्हें हटा सकते हैं। सरकार उन्हें इस्तीफा देने के लिए कह सकती है, और यदि वे नहीं मानते हैं, तो महाभियोग लाकर उन्हें हटाने का प्रयास कर सकती है। यदि सरकार महाभियोग लाती है, तो विपक्ष का समर्थन भी मिल सकता है।
हालांकि, यह स्पष्ट है कि सरकार न तो उनका इस्तीफा कराएगी और न ही महाभियोग लाएगी। इसका कारण यह है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा भाजपा पर सीधा असर डालेगा। यदि वे इस्तीफा देते हैं, तो विपक्ष चुनाव आयोग के कार्यों पर सवाल उठाएगा और सरकारों को बर्खास्त करने की मांग करेगा। यह समझना आसान है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा एक सामान्य प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा से जुड़ा है। विपक्ष इसकी संवेदनशीलता को समझ रहा है।
विपक्ष इस मामले की जटिलता को भी समझता है। पहले जब प्रदर्शन हुए, तो सरकार ने कई बार पीछे हटने का निर्णय लिया। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त का मामला इससे भिन्न है। यह नीतिगत या प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं है। इसलिए, सरकार इस मामले में पीछे नहीं हट सकती। यह सवाल बना हुआ है कि यह गतिरोध कैसे समाप्त होगा। यदि सरकार इस्तीफा नहीं कराएगी और विपक्ष आंदोलन समाप्त नहीं करेगा, तो क्या यह गतिरोध स्थायी रहेगा?
विपक्ष चाहता है कि यह गतिरोध अगले चुनावों तक बना रहे। हालांकि, उसे यह भी पता है कि एसआईआर का मामला आम जनता के बीच ज्यादा समर्थन नहीं बना रहा है। लेकिन इस बहाने उसने लोगों के गुस्से को एक दिशा दी है। लोगों का गुस्सा कई कारणों से है, जैसे पेपर लीक, नौकरी की कमी, और महंगाई। विपक्ष यह स्थापित करने का प्रयास कर रहा है कि सरकार में जनता का विश्वास नहीं रह गया है।
दूसरी ओर, सरकार का रवैया विपक्ष को थकाने वाला है। वह अगले साल होने वाले चुनावों का इंतजार कर रही है। सरकार को विश्वास है कि उसकी चुनावी मशीनरी और नैरेटिव उसे चुनाव जीतने में मदद करेंगे। एक बार चुनाव जीतने के बाद, विपक्ष के मुद्दे अपने आप समाप्त हो जाएंगे।
दोनों पक्षों के लक्ष्य स्पष्ट हैं। विपक्ष का प्रयास है कि सरकार की साख खत्म हो जाए, जबकि सरकार का लक्ष्य चुनाव जीतना है। इस लड़ाई में आम जनता प्रभावित हो रही है। दिल्ली में पिछले एक हफ्ते से जनजीवन अस्तव्यस्त है। मेट्रो स्टेशन बंद होने से यात्रियों को परेशानी हो रही है और इंटरनेट बंद होने से लोगों को नुकसान हो रहा है।
त्योहारों का मौसम आ गया है, लेकिन दिल्ली में रौनक नहीं है। विपक्ष को पता है कि इसकी कुछ जिम्मेदारी उसकी है, लेकिन नाराजगी सरकार के प्रति बढ़ रही है। सरकार के विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के तरीके जनता के गुस्से को और बढ़ा रहे हैं। लंबे समय में, इसका चुनावी नुकसान सत्तारूढ़ दल को हो सकता है।
सरकार इस बात को समझती है, लेकिन उसके पास गतिरोध को समाप्त करने का कोई रास्ता नहीं है। प्रदर्शन की अनुमति देने और रोकने के प्रयासों से कुछ नहीं हो रहा है। ऐसा लगता है कि यह चक्र चलता रहेगा। संसद का शीतकालीन सत्र और पांच राज्यों के चुनाव भी निकट हैं। यदि विरोध प्रदर्शन जारी रहा, तो यह गतिरोध चुनावों से पहले समाप्त नहीं होगा।
