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झारखंड की राज्यसभा चुनाव में हेमंत सोरेन की रणनीति का विश्लेषण

झारखंड की राज्यसभा चुनाव में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रणनीति ने नाथवानी की जीत को सुनिश्चित किया। इस लेख में जानें कि कैसे सोरेन ने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनावी खेल को प्रभावित किया। महाभारत की एक कथा के संदर्भ में, यह विश्लेषण करता है कि कैसे सोरेन ने अपने उम्मीदवारों के लिए वोटों का आवंटन किया और नाथवानी के नामांकन को सुरक्षित रखा। क्या यह चुनावी खेल सोरेन की राजनीतिक चतुराई का परिणाम है? पढ़ें पूरी कहानी।
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झारखंड की राज्यसभा चुनाव में हेमंत सोरेन की रणनीति का विश्लेषण

हेमंत सोरेन की चुनावी चालें


महाभारत की एक कथा में भगवान श्रीकृष्ण ने भीम के पुत्र घटोत्कच के बेटे बर्बरीक का सिर काटकर एक स्थान पर रखा था। युद्ध के 18 दिन बाद जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने क्या देखा, तो बर्बरीक ने उत्तर दिया कि दोनों पक्षों में आप ही लड़ रहे थे। इस संदर्भ में झारखंड की दो राज्यसभा सीटों की स्थिति को समझा जा सकता है। वास्तव में, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ही इस चुनाव में मुख्य भूमिका में थे। भले ही परिमल नाथवानी भाजपा के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार थे, लेकिन उनकी जीत भी हेमंत सोरेन की रणनीति का परिणाम थी। कांग्रेस के नेता खुलकर नहीं बोल रहे हैं, लेकिन अनौपचारिक बातचीत में यह दावा किया जा रहा है कि हेमंत नहीं चाहते थे कि कांग्रेस का उम्मीदवार जीतें। यह ध्यान देने योग्य है कि प्रणब झा या अन्य उम्मीदवारों के नाम की घोषणा से पहले ही उन्होंने नाथवानी के नाम पर सहमति दे दी थी।


हेमंत सोरेन ने कांग्रेस के साथ मिलकर नाथवानी की जीत सुनिश्चित करने के लिए तीन महत्वपूर्ण कदम उठाए। पहला, उन्होंने नाथवानी का नामांकन रद्द नहीं होने दिया। दरअसल, नाथवानी का नामांकन भाजपा के एक नेता के वकील बेटे द्वारा भरा गया था। कांग्रेस ने इस पर्चे में कम से कम तीन गलतियाँ पकड़ीं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन का पर्चा एक ऐसी गलती के कारण खारिज कर दिया गया था, जो वास्तव में थी ही नहीं। लेकिन नाथवानी के पर्चे में तीन गलतियाँ थीं, फिर भी उन्हें नोटिस दिया गया और 24 घंटे का समय दिया गया। विधानसभा का सचिव राज्यसभा चुनाव में चुनाव अधिकारी होता है। खबर है कि हेमंत सोरेन ने कई बार फोन करके सुनिश्चित किया कि पर्चा रद्द न हो। यदि पर्चा रद्द हो जाता, तो उसी दिन जेएमएम और कांग्रेस के उम्मीदवार जीत जाते। लेकिन राज्य सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि नाथवानी का पर्चा रद्द न हो। जानकार सूत्रों का कहना है कि पर्चे में इतनी गड़बड़ी थी कि उसे चुपचाप दोबारा भरवा कर जमा कराया गया।


दूसरा प्रमाण यह है कि हेमंत सोरेन की पार्टी के उम्मीदवार बैद्यनाथ राम को 31 वोट मिले। यह संख्या अनावश्यक थी, क्योंकि उनका उम्मीदवार 28 वोट पर भी जीत सकता था। लेकिन हेमंत ने जानबूझकर 31 वोट उनके लिए आवंटित किए। यह कहा जा सकता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यदि कांग्रेस का उम्मीदवार दूसरे स्थान पर आता, तो स्वचालित रूप से 28 से अधिक वोट उनके खाते में चले जाते। लेकिन हेमंत ने अपने सभी 34 वोट क्यों नहीं बैद्यनाथ राम को आवंटित किए? दरअसल, हेमंत को पता था कि नाथवानी को 30 वोट मिल रहे हैं, इसलिए उन्होंने अपने उम्मीदवार को उनसे एक वोट अधिक आवंटित किया। यह भी कहा जा रहा है कि उन्होंने सुनिश्चित किया कि महागठबंधन के कौन-कौन से विधायक नाथवानी को वोट देंगे।


तीसरा प्रमाण कम और संकेत अधिक है। जिस दिन से परिमल नाथवानी को उम्मीदवार बनाया गया, उस दिन से जेएमएम के सोशल मीडिया हैंडल से भाजपा और केंद्र सरकार पर हमले बढ़ गए थे। इससे यह संकेत मिलता है कि जेएमएम को जो करना था, उसे छिपाने के लिए एक रणनीति बनाई जा रही थी। झारखंड में यह भी कहा जा रहा है कि हेमंत ने पहले परिमल नाथवानी को अपनी पार्टी से लड़ने का प्रस्ताव दिया था, और जब वे निर्दलीय लड़े, तो हेमंत, उनकी पत्नी कल्पना सोरेन और हेमंत के भाई बसंत सोरेन ने नाथवानी के पक्ष में वोट दिया।