ट्रेन ड्राइवर्स की कठिनाइयाँ: बुनियादी सुविधाओं की कमी
नई दिल्ली में ट्रेन ड्राइवर्स की चुनौतियाँ
नई दिल्ली: जब यात्रा के दौरान अचानक टॉयलेट की आवश्यकता महसूस होती है, तो यात्री तुरंत वॉशरूम की ओर बढ़ते हैं। लेकिन ट्रेन ड्राइवर्स (लोको पायलट) के लिए यह एक गंभीर समस्या बन जाती थी, क्योंकि कई वर्षों तक उन्हें इस बुनियादी जरूरत का सामना करना पड़ा। इंजन में वॉशरूम की अनुपस्थिति के कारण, यदि किसी पायलट को इमरजेंसी का सामना करना पड़ता था, तो उसे कंट्रोल रूम को एक गुप्त कोड वर्ड भेजना पड़ता था— 'I am sick' यानी 'मेरी तबीयत खराब है'। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि टॉयलेट जाने की मजबूरी का संकेत था, जिसके बाद अगले बड़े स्टेशन पर एक नए ड्राइवर की व्यवस्था की जाती थी।
इंजन को अकेला छोड़ने पर पाबंदी और लंबी ड्यूटी
रेलवे के नियमों के अनुसार, लोको पायलट को किसी भी स्थिति में इंजन को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। कागजों पर ड्यूटी 8 घंटे की होती है, लेकिन ट्रेन के लेट होने पर यह 10 से 12 घंटे तक बढ़ सकती है। राजधानी या गरीब रथ जैसी लंबी दूरी की ट्रेनों में यह समस्या और भी गंभीर हो जाती थी। ड्यूटी शुरू करने से पहले ड्राइवर पूरी तरह से तैयार होकर केबिन में बैठते थे, ताकि उन्हें घंटों तक कोई परेशानी न हो। ट्रेन के अन्य स्टाफ जैसे टीटीई और गार्ड अपने केबिन के टॉयलेट का उपयोग कर सकते थे, लेकिन लोको पायलट को बिना किसी बुनियादी सुविधा के इंजन में रहना पड़ता था।
2 मिनट का ठहराव और दंड का डर
रेलवे का तर्क है कि इंजन के पीछे लगे एसएलआर (SLR) कोच में टॉयलेट की सुविधा होती है। हालांकि, ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन (AILRSA) के अनुसार, अधिकांश स्टेशनों पर ट्रेनों का ठहराव केवल 1 से 2 मिनट का होता है। इतने कम समय में इंजन से उतरकर वापस आना किसी भी ड्राइवर के लिए असंभव होता है। यदि वॉशरूम जाने के कारण ट्रेन 2 मिनट भी लेट हो जाती है, तो ड्राइवर पर जवाब-तलब, चार्जशीट और दंड का खतरा मंडराने लगता है। रात के समय यात्रा करना इस चुनौती को और भी कठिन बना देता है।
नई इंजनों में सुविधाएँ, लेकिन महिला ड्राइवर्स के लिए चुनौतियाँ जारी
लोको पायलट्स के लंबे संघर्ष और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर मुद्दों को ध्यान में रखते हुए रेलवे ने कुछ सुधार किए हैं। अब नई पैसेंजर और मालगाड़ियों के इंजनों में बायो-टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध है। हालांकि, यह बदलाव अभी भी पूरी तरह से समावेशी नहीं है। वर्तमान में अधिकांश टॉयलेट केवल पुरुष ड्राइवर्स की आवश्यकताओं के अनुसार बनाए गए हैं। इस कारण महिला लोको पायलट्स को आज भी ड्यूटी के दौरान असहजता और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए नई गाइडलाइंस और सुधार की मांग की जा रही है।
