डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच शांति समझौता: नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति पर प्रभाव
शांति समझौते का महत्व
एक महीने तक चले गंभीर सैन्य संघर्ष के बाद, डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के बीच हुआ अंतरिम शांति समझौता वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण राहत के रूप में उभरा है। वाशिंगटन इसे अपनी कूटनीतिक सफलता मान रहा है, जबकि ईरान ने भी अपनी स्थिति को पूरी तरह से नहीं छोड़ा है। इस संघर्ष में कोई स्पष्ट विजेता भले ही न हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि इस टकराव का सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन 'बिबी' नेतन्याहू को हुआ है। नए मध्य पूर्व का सपना दिखाने वाले नेतन्याहू अब अपने ही जाल में फंस चुके हैं। पिछले तीन वर्षों से ईरान, हमास और हिज़्बुल्लाह के साथ चल रहे संघर्ष ने इज़राइल को मोर्चे पर व्यस्त रखा, लेकिन स्थायी शांति या सुरक्षा प्रदान नहीं की। अब, जब इज़राइल एक संवेदनशील चुनाव की दहलीज़ पर है, यह सवाल उठता है कि क्या ईरान-अमेरिका समझौते ने 'बिबी' के राजनीतिक भविष्य को समाप्त कर दिया है?
नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति
नए मध्य पूर्व की स्थिति कुछ इस प्रकार है: हमास गाजा के एक हिस्से पर नियंत्रण बनाए हुए है, लेबनान में हिज़्बुल्लाह का प्रभाव बना हुआ है, और ईरान का शासन एक नए नेता और शक्तिशाली इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (आईआरजीसी) के साथ स्थिर है। इसके अलावा, इज़राइल और अमेरिका ने मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ा, लेकिन तेल अवीव को शांति वार्ता से काफी हद तक बाहर रखा गया। ट्रंप द्वारा पाकिस्तान को मध्यस्थ के रूप में चुनना स्थिति को और भी जटिल बना देता है। कड़वी सच्चाई यह है कि नेतन्याहू ने अपनी जंग पर सब कुछ दांव पर लगा दिया। अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते ने इज़राइल के कई लक्ष्यों को अधूरा छोड़ दिया है और इससे नेतन्याहू और ट्रंप के रिश्ते भी प्रभावित हुए हैं। अब नेतन्याहू के पास चुनाव से चार महीने पहले दिखाने के लिए कोई उपलब्धि नहीं है।
लेबनान का मुद्दा
इज़राइल को सबसे ज्यादा नाराजगी इस डील में लेबनान के शामिल होने से हुई है। यह डील इज़राइल को उस देश में सैन्य कार्रवाई करने से रोकती है, जबकि ईरान ने लेबनान में हिज़्बुल्लाह समेत अपने प्रॉक्सी समूहों को नियंत्रित करने पर सहमति जताई है। नेतन्याहू के लिए यह एक चौंकाने वाली स्थिति थी। देश में विरोध की आशंका को देखते हुए, उन्होंने स्पष्ट किया कि इज़राइल उन क्षेत्रों से पीछे नहीं हटेगा जिन पर उसका कब्जा है। यह घटनाक्रम नेतन्याहू के लिए एक कड़ा सबक साबित हुआ है।
चुनाव से पहले की चुनौतियाँ
नेतन्याहू के कार्यकाल की एक और बड़ी चुनौती अक्टूबर 2023 में हुई सुरक्षा चूक थी, जब हमास ने इज़राइल पर हमला किया। इज़राइल की मजबूत इंटेलिजेंस सेवा के बावजूद, वह इस अचानक हमले का पूर्वानुमान नहीं लगा सकी, जिसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए। ईरान के खिलाफ सफल अभियान नेतन्याहू के लिए अपनी छवि सुधारने का एक अवसर होता, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। वास्तव में, नेतन्याहू अक्टूबर 2023 के बाद से एकमात्र बड़े नेता हैं जिन्होंने न तो इस्तीफा दिया और न ही माफी मांगी।
