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तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना: टूटने की समानताएँ और असमानताएँ

तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना के बीच हाल की टूटने की घटनाओं की तुलना की जा रही है। दोनों पार्टियों में सांसदों और विधायकों के टूटने की समानताएँ हैं, लेकिन ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे के बीच महत्वपूर्ण असमानताएँ भी हैं। क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी को फिर से खड़ा कर पाएंगी? इस लेख में जानें इन घटनाओं का गहराई से विश्लेषण।
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तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना: टूटने की समानताएँ और असमानताएँ

तृणमूल कांग्रेस और शिव सेना की तुलना


हाल के दिनों में, शिव सेना और तृणमूल कांग्रेस के बीच तुलना की जा रही है, खासकर जब एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे की पार्टी पर नियंत्रण पाया। दोनों पार्टियों में टूटने की कुछ समानताएँ हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण असमानता भी है। समानता यह है कि दोनों के सांसद और विधायक टूट गए हैं। दोनों में से दो तिहाई से अधिक विधायकों ने अलग गुट की मान्यता प्राप्त कर ली है, और सांसद भी एक नई पार्टी में शामिल हो गए हैं।


हालांकि, महाराष्ट्र में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि शिंदे ने उद्धव ठाकरे को कुछ चीजें छोड़ दीं, जैसे शिव सेना का मुख्यालय और 'सामना' अखबार। इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल में बागी नेताओं की नजर पार्टी के खजाने पर भी है। एक विधायक की शिकायत के बाद, तृणमूल कांग्रेस के तीन बैंक खाते सील कर दिए गए हैं, जिनमें कई करोड़ रुपये हैं।


एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक हैं, जबकि उद्धव ठाकरे शिव सेना के संस्थापक नहीं थे। शिव सेना की स्थापना बाल ठाकरे ने की थी, और उनके भतीजे राज ठाकरे को पहले असली उत्तराधिकारी माना जाता था। लेकिन बाल ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव को उत्तराधिकारी बनाया, जिसके बाद पार्टी के कमजोर होने की शुरुआत हुई।


ममता बनर्जी का मामला अलग है। आमतौर पर, प्रादेशिक पार्टियों का ढांचा इतना मजबूत होता है कि संस्थापक के जीवित रहते कोई और उस पर कब्जा नहीं कर सकता। हालांकि, तेलुगू देशम पार्टी का उदाहरण मिलता है, जहां एनटी रामाराव की पत्नी लक्ष्मी पार्वती को पार्टी सौंपने का प्रयास विफल रहा और चंद्रबाबू नायडू ने बगावत कर दी।


इस प्रकार, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पहली बड़ी प्रादेशिक पार्टी हो सकती है, जिसमें संस्थापक को पार्टी से बेदखल कर दिया जाएगा। क्या ममता बनर्जी एक नई पार्टी स्थापित कर पाएंगी?