दिल्ली के कचरे से बनी सड़कों का निर्माण: 14.4 लाख टन कचरे का उपयोग
दिल्ली में कचरे का उपयोग सड़क निर्माण में
दिल्ली: राजधानी दिल्ली में कचरे के पहाड़ों का उपयोग अब बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण में किया जा रहा है। लैंडफिल साइट्स पर जमा पुराने कचरे का न केवल पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि यह देश की आधुनिक सड़कों का आधार भी बन रहा है। केंद्रीय राज्यमंत्री और प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा ने जानकारी दी कि विभिन्न हाईवे प्रोजेक्ट्स में अब तक 14.4 लाख मीट्रिक टन कचरे का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है।
इस पहल की सबसे बड़ी उपलब्धि 75 किलोमीटर लंबे अर्बन एक्सटेंशन रोड (यूईआर-2) का निर्माण है, जिस पर आज वाहन तेज गति से चल रहे हैं। इस सड़क के निर्माण में भलस्वा लैंडफिल साइट से 10.2 लाख मीट्रिक टन कचरे का इस्तेमाल किया गया है। यह कचरा प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण है, जो निर्माण लागत और संसाधनों की बचत में भी सहायक साबित हुआ है।
कचरे से सड़क निर्माण का यह प्रयास यूईआर-2 तक सीमित नहीं है। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के एक महत्वपूर्ण खंड, जो डीएनडी से सोहना तक फैला है, में 3.4 लाख मीट्रिक टन कचरे का उपयोग किया गया है। यह कचरा ओखला और गाजीपुर लैंडफिल साइटों से लिया गया था, जिससे उन क्षेत्रों में कचरे के पहाड़ों की ऊंचाई को कम करने में मदद मिली है। इसके अलावा, 39.5 किलोमीटर लंबे बहसूमा-बिजनौर हाईवे के निर्माण में भी दिल्ली के कचरे का उपयोग किया जा रहा है, जिसमें कुल 0.8 लाख मीट्रिक टन कचरा शामिल है।
For years, Delhi saw mountains of waste at Okhla, Bhalswa and Ghazipur.
Now, Delhi is seeing action.
With scientific waste processing and continuous clearance efforts, these legacy landfill sites are being reduced step by step.
A cleaner, healthier and greener Delhi is taking… pic.twitter.com/1NqeFZKQIr
— Delhi Government (@DelhiGovDigital) June 15, 2026
कचरे के पहाड़ों को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन-2 के तहत हाईवे प्रोजेक्ट्स में कचरे का उपयोग अनिवार्य कर दिया था। इसके बाद एनएचएआई (NHAI) ने दिल्ली सरकार और एमसीडी से संपर्क किया, जिसके सकारात्मक परिणाम अब सड़कों के रूप में दिखाई दे रहे हैं।
तकनीकी रूप से हाईवे निर्माण में इस कचरे का उपयोग सावधानीपूर्वक किया जा रहा है। हाईवे के किनारे बांध बनाने के साथ-साथ, हाईवे कैरिजवे के भीतरी लेयर को 250 एमएम तक बनाने में भी इसी कचरे का इस्तेमाल किया गया है। इतना ही नहीं, सड़कों के साथ बनने वाली सर्विस लेन के निर्माण में भी इसी कचरे का उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है।
दिल्ली के शहरी विकास विभाग और एनएचएआई अब अन्य आगामी रोड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भी कचरे के इस्तेमाल की योजना बना रहे हैं। इस पहल से जहां एक तरफ कचरे के पहाड़ों से दिल्लीवासियों को निजात मिलने की उम्मीद जगी है, वहीं दूसरी तरफ टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है।
बता दें कि पिछले माह 28 मई को केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्री मनोहर लाल ने भलस्वा लैंडफिल साइट का औचक दौरा कर वहां चल रहे बायो-माइनिंग और बायो-रेमेडिएशन कार्यों का विस्तृत जायजा लिया था। केंद्रीय मंत्री ने न केवल चल रहे कार्यों की प्रगति की समीक्षा की, बल्कि अधिकारियों को आगामी मॉनसून से पहले काम की गति और अधिक तेज करने के कड़े निर्देश दिए थे। भलस्वा साइट पर वर्तमान में वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग कर कचरे को अलग करने (बायो-माइनिंग) का काम मिशन मोड में चल रहा है।
अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, जून 2022 में इस साइट पर लगभग 73 लाख मीट्रिक टन लीगेसी कचरा जमा था। निरंतर प्रयासों और आधुनिक मशीनों की तैनाती के बाद अब तक कचरे की मात्रा घटकर करीब 23.17 लाख मीट्रिक टन रह गई है। साइट के कुल 70 एकड़ के दायरे में से 43 एकड़ भूमि अब तक पूरी तरह से खाली कराई जा चुकी है। भलस्वा लैंडफिल साइट दिल्ली की सबसे पुरानी डंपसाइट्स में से एक है, जो 1994 में शुरू हुई थी और 2006 में ही ओवरफ्लो घोषित कर दी गई थी।
