नारायण दत्त तिवारी: एक प्रेरणादायक नेता की कहानी
नारायण दत्त तिवारी की विरासत
नारायण दत्त तिवारी की कहानी: राजनीति हमेशा अतीत, वर्तमान और भविष्य को समेटे चलती है। यह किस्से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का नाम राजनीति की यादों में आदर के साथ लिया जाता है। प्रयागराज, जिसे पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था, अपनी प्रतिभाओं की यादों को संजोने में हमेशा तत्पर रहता है। वरिष्ठ पत्रकार रतीभान त्रिपाठी का भी इस शहर से गहरा संबंध है। जब वे अपने पत्रकारिता के अनुभवों को साझा करते हैं, तो तिवारी जी का नाम प्रमुखता से आता है।
आज 18 अक्टूबर है, जो नारायण दत्त तिवारी का जन्मदिन है। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में 'विकास पुरुष' शब्द प्रचलित है। हर मुख्यमंत्री के समर्थक उन्हें इस उपाधि से नवाजते हैं, लेकिन वास्तव में तिवारी जी को ही इस उपाधि का असली हकदार माना जाता है। मेरे पास तिवारी जी से जुड़ी कई यादें हैं, लेकिन एक घटना जो मुझे याद आती है, वह है जब मैंने उनसे पहली बार व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी।
यह घटना 1995 की है, जब कांग्रेस में काफी हलचल थी। तिवारी जी इससे नाराज होकर अर्जुन सिंह सहित कई नेताओं के साथ अपनी अलग पार्टी बनाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए यात्रा शुरू की, और इलाहाबाद कांग्रेसियों का तीर्थ स्थल था। तिवारी जी अपनी यात्रा के दौरान इलाहाबाद आए थे।
तिवारी जी के करीबी मित्र और स्वतंत्रता सेनानी पीडी टंडन ने मुझे फोन किया। उस समय मैं दैनिक जागरण में रिपोर्टर था। टंडन जी ने कहा कि एनडी तिवारी उनके घर आ रहे हैं, और मैं चाहूं तो उनका इंटरव्यू कर सकता हूं, लेकिन अकेले आना होगा। मैंने कहा कि मैं फोटोग्राफर लाऊंगा, तो उन्होंने कहा कि उसे भी लाना।
टंडन जी समय के बहुत पाबंद थे। उन्होंने जो समय दिया, उस पर पहुंचना अनिवार्य था। मैंने अपने फोटोग्राफर शरद मालवीय के साथ समय पर पहुंचा। एनडी तिवारी का काफिला बाहर था, और सभी नेता कार्यकर्ता दरवाजे के बाहर ही रुके हुए थे। यह तिवारी जी की पीडी टंडन से व्यक्तिगत मुलाकात थी।
टंडन जी के परिवार के अलावा वहां कोई तीसरा व्यक्ति मैं ही था। शरद को केवल फोटो खींचने का मौका मिला। टंडन जी ने तिवारी जी से मेरा परिचय कराया। मैं युवा था, और मेरी तारीफ सुनकर तिवारी जी प्रसन्न हुए।
मैंने तिवारी जी से उस समय के राजनीतिक हालात पर सवाल किए। उनके पार्टी गठन और यात्रा के बारे में पूछे। तिवारी जी एक अनुभवी और चतुर नेता थे। उनके उत्तरों ने और सवाल खड़े किए। टंडन जी ने तिवारी जी की यादों को साझा करने के लिए कहा।
तिवारी जी भावुक हो गए और टंडन जी की ओर देखते हुए बोले, 'यह मेरा मंदिर है, ये मेरे देवता हैं। मैं पहाड़ से आया था, और इन्होंने ही मेरी मदद की। मैं आज जो कुछ हूं, उनकी मदद के बिना संभव नहीं होता।'
टंडन जी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि अब चाय पीजिए और उन्हें जाने दीजिए क्योंकि शाम का समय है। तिवारी जी बाद में कई बार इलाहाबाद आए और हर बार पीडी टंडन के बारे में पूछते थे।
(वरिष्ठ पत्रकार रतीभान त्रिपाठी)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
(फोटो में बाएं वरिष्ठ पत्रकार रतीभान त्रिपाठी, बीच में एनडी तिवारी और दाएं पीडी टंडन)
फोटो क्रेडिट : शरद मालवीय, वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट।
