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पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की स्थिति: भाजपा सरकार के चार महीने बाद की रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के चार महीने पूरे होने के बाद घुसपैठियों के मुद्दे पर चर्चा में कमी आई है। चुनाव से पहले जो प्रचार हुआ था, वह अब ठंडा पड़ गया है। हाल की रिपोर्ट में बताया गया है कि न तो घुसपैठियों की खोज की जा रही है और न ही उन्हें पकड़ा जा रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठिए स्थानीय आबादी में घुलमिल गए हैं, जिससे उनकी पहचान करना मुश्किल हो गया है। जानकारों का कहना है कि भाजपा ने चुनाव में जितने घुसपैठियों का दावा किया था, वास्तव में उतने नहीं थे।
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घुसपैठियों की चर्चा में कमी


पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार को चार महीने होने वाले हैं, और इस दौरान घुसपैठियों के मुद्दे पर चर्चा काफी कम हो गई है। चुनाव से पहले जो प्रचार हुआ था और चुनाव के बाद जो कार्रवाई की गई थी, वह अब ठंडी पड़ गई है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, न तो घुसपैठियों की खोज की जा रही है, न ही उन्हें पकड़ा जा रहा है, और न ही उन्हें देश से बाहर निकाला जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार द्वारा बनाए गए डिटेंशन सेंटर में अब केवल एक सौ से कुछ अधिक लोग रह गए हैं, जिन्हें सीमा पार नहीं भेजा जा रहा है। पहले तीन हजार के करीब लोग पकड़े गए थे, जिनमें से अधिकांश को पहले ही छोड़ दिया गया।


जानकारों का कहना है कि भाजपा ने चुनाव में जितने घुसपैठियों का दावा किया था, वास्तव में उतने बंगाल में नहीं थे। यदि घुसपैठिए हैं भी, तो उनकी पहचान करना और उन्हें निकालना एक कठिन कार्य है। सीमावर्ती मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में घुसपैठिए अब स्थानीय आबादी में इस तरह घुलमिल गए हैं कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो गया है। यह भी कहा जा रहा है कि यह एक राजनीतिक रणनीति थी, जिसका लाभ भाजपा ने उठाया। यदि भाजपा वास्तव में गंभीर होती, तो पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में घुसपैठियों के खिलाफ व्यापक अभियान चलाती। लेकिन अब चूंकि इन राज्यों में चुनाव नहीं हैं, इसलिए इस मुद्दे पर चर्चा भी कम हो गई है।