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पाकिस्तान में सेना प्रमुख की बढ़ती ताकत: क्या संसद की भूमिका खत्म हो गई?

पाकिस्तान में सेना प्रमुख असीम मुनीर की बढ़ती ताकत ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या संसद की भूमिका खत्म हो गई है। सऊदी अरब में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती के निर्णय ने इस मुद्दे को और भी गंभीर बना दिया है। क्या अब पाकिस्तान में असली सत्ता सेना के हाथ में है? जानें इस लेख में पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिति और सेना के प्रभाव के बारे में।
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पाकिस्तान में सत्ता का असली केंद्र

क्या पाकिस्तान में असली शक्ति प्रधानमंत्री और संसद के हाथ में है, या फिर सेना प्रमुख असीम मुनीर के पास? यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है, क्योंकि मुनीर ने सऊदी अरब में अतिरिक्त पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती का निर्णय लिया है। उल्लेखनीय है कि 2015 में पाकिस्तान की संसद ने यमन युद्ध में भाग न लेने का निर्णय लिया था, लेकिन अब उसी निर्णय के विपरीत सैन्य तैनाती की योजना बनाई जा रही है। यह भी बताया जा रहा है कि इस तैनाती से पहले शहबाज शरीफ से कोई सलाह नहीं ली गई। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या अब पाकिस्तान में संसद की नहीं, बल्कि सेना प्रमुख की बात मानी जा रही है?


सेना का राजनीतिक प्रभाव

पाकिस्तान में सेना का राजनीतिक प्रभाव कोई नई बात नहीं है। देश के इतिहास में कई बार सैन्य शासन और सेना के पीछे से सरकार को प्रभावित करने के उदाहरण मिलते हैं। लेकिन अब फील्ड मार्शल असीम मुनीर के नेतृत्व में रक्षा और विदेश नीति में सेना की भूमिका फिर से चर्चा का विषय बन गई है। अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौता हुआ था, जिसके तहत किसी सदस्य पर हमला अन्य सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इस समझौते के बाद से हूतियों ने सऊदी अरब पर हमले तेज कर दिए थे, लेकिन पाकिस्तान और तुर्किये की चुप्पी ने इस समझौते की वैधता पर सवाल खड़े कर दिए थे।


सैन्य तैनाती की नई जानकारी

रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान पहले ही सऊदी अरब में लगभग 8,000 सैनिक भेज चुका है। अब अतिरिक्त सैन्य सहायता की प्रतिबद्धता सामने आई है। हालांकि, नई तैनाती की संख्या, अवधि, मिशन और संभावित युद्ध में भूमिका के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने कहा है कि सभी आवश्यक सरकारी प्रक्रियाएं पूरी की गई हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस निर्णय में मंत्रिमंडल या संसद की क्या भूमिका थी।


संसद की भूमिका पर सवाल

यहां यह सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति में निर्वाचित संस्थाओं की भूमिका लगातार कम होती जा रही है? कहा जा रहा है कि ये सभी निर्णय अकेले मुनीर ने लिए हैं और इसकी जानकारी शहबाज शरीफ को भी नहीं दी गई। याद रहे कि अप्रैल 2015 में यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में शामिल होने के सवाल पर पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से तटस्थ रहने का निर्णय लिया था।


सऊदी अरब की रक्षा में बढ़ती प्रतिबद्धता

आज की स्थिति में अंतर यह है कि सऊदी अरब की रक्षा के लिए सैन्य प्रतिबद्धता बढ़ाई जा रही है, जबकि 2015 में संसद ने सीधे यमन अभियान में भाग लेने से परहेज किया था। नई तैनाती के संभावित युद्ध संबंधी परिणामों पर पाकिस्तान संसद में बहस न होना लोकतांत्रिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यह स्पष्ट है कि पाकिस्तानी सेना अब घरेलू सत्ता-संरचना में कहीं अधिक प्रभावशाली हो चुकी है।


पाकिस्तान की सुरक्षा चुनौतियाँ

सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष भी तेजी से बढ़ रहा है। हाल ही में रियाद और आभा के हवाई अड्डों पर हुए हमलों में कई लोग मारे गए और घायल हुए। इसके बाद एयर इंडिया, इंडिगो और अकासा एयर ने रियाद जाने वाली उड़ानें अस्थायी रूप से रोक दीं। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने जवाबी कार्रवाई में हूतियों के ठिकानों पर हमले किए हैं। इस बढ़ते संघर्ष ने न केवल खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात और व्यापार पर भी गंभीर असर डाला है।


पाकिस्तान के सामने संभावित जोखिम

पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा जोखिम यह है कि सऊदी अरब की रक्षा के लिए शुरू की गई तैनाती धीरे-धीरे यमन में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई में बदल सकती है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें हूतियों द्वारा पाकिस्तानी सैनिकों या ठिकानों को निशाना बनाए जाने का खतरा शामिल है। इसके अलावा, यह ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंधों पर भी दबाव डाल सकता है।