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बिहार विधान परिषद चुनाव: एनडीए की रणनीतियों का विश्लेषण

बिहार में हाल ही में हुए विधान परिषद चुनावों में एनडीए की सहयोगी पार्टियों ने अपनी-अपनी रणनीतियों के अनुसार उम्मीदवारों का चयन किया। इस चुनाव में सामाजिक समीकरणों का ध्यान नहीं रखा गया, जिससे विभिन्न जातियों के उम्मीदवारों का चयन हुआ। नीतीश कुमार, भाजपा और लोजपा ने मिलकर अपनी ताकत को दर्शाया, जबकि चिराग पासवान ने मुस्लिम प्रत्याशी को भी मैदान में उतारा। जानिए इस चुनाव के पीछे की राजनीति और उम्मीदवारों के चयन की कहानी।
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बिहार विधान परिषद चुनाव: एनडीए की रणनीतियों का विश्लेषण

बिहार में विधान परिषद चुनाव का परिणाम


बिहार में विधान परिषद की नौ सीटों के लिए चुनाव आयोजित किए गए, जिसमें एक सीट पर उपचुनाव भी हुआ। इन दस सीटों के चुनाव में एनडीए की सभी सहयोगी पार्टियों ने अपनी-अपनी रणनीतियों के अनुसार उम्मीदवारों का चयन किया। इसका मतलब यह है कि एनडीए के तहत एकजुट होकर उम्मीदवारों का चयन नहीं किया गया। पार्टियों ने आपस में बातचीत करके सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों का ध्यान नहीं रखा, बल्कि अपने-अपने वोट बैंक के अनुसार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा।


एक सकारात्मक पहलू यह रहा कि इस बार राज्यसभा और विधान परिषद की सीटों को पैसे के बल पर बेचने के आरोप नहीं लगे, क्योंकि सभी पार्टियों ने राजनीतिक व्यक्तियों को ही उम्मीदवार बनाया। हालांकि, राजद के सुनील सिंह के बारे में कुछ चर्चा हुई, लेकिन वे पिछले छह वर्षों से एमएलसी हैं और राजद के कोषाध्यक्ष भी हैं, इसलिए यह कोई विवाद का विषय नहीं बना।


एनडीए की उम्मीदवारों की सूची

एनडीए की उम्मीदवारों की सूची सबसे दिलचस्प रही। नीतीश कुमार को तीन, भाजपा को चार और लोजपा को एक सीट मिली। इसके अलावा, नीतीश के इस्तीफे से खाली हुई सीट उनकी पार्टी को मिली, जिस पर उन्होंने धानुक जाति के ललन प्रसाद को उम्मीदवार बनाया। यह ध्यान देने योग्य है कि नीतीश पहले ही सरकार में दो धानुक मंत्रियों को शामिल कर चुके हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे कोईरी, कुर्मी और धानुक जातियों के समीकरण को बनाए रखना चाहते हैं।


दिलचस्प यह भी रहा कि जनता दल ने एक कुम्हार उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जबकि भाजपा ने भी इसी जाति के एक उम्मीदवार को चुना। यह अति पिछड़ी जाति की आबादी भले ही कम हो, लेकिन एनडीए के आठ में से दो उम्मीदवार इसी जाति से हैं। वहीं, चिराग पासवान ने मुस्लिम प्रत्याशी को भी उतारा, जो एनडीए में रहकर मुस्लिम को विधान परिषद में भेजने का एक महत्वपूर्ण निर्णय था। चिराग पासवान अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।