ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली में शुरू हुआ बाजार
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तैयारियों में तेजी
भारत में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तैयारियों में तेजी आई है। इस संदर्भ में नई दिल्ली के राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय और हस्तकला अकादमी में ब्रिक्स बाजार की शुरुआत की गई है। वस्त्र मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की इस पहल के तहत सदस्य और भागीदार देशों की कला, शिल्प और हथकरघा परंपराओं को प्रदर्शित किया जा रहा है। यह बाजार 10 सितंबर से 15 सितंबर तक चलेगा, जहां आगंतुक विभिन्न देशों की पारंपरिक कला और कारीगरी का अनुभव कर सकेंगे।
ब्रिक्स बाजार में सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन
ब्रिक्स बाजार में विभिन्न सदस्य और भागीदार देशों की पारंपरिक कलाओं का एकत्रीकरण किया गया है। विभिन्न देशों के कारीगर और शिल्प प्रतिनिधि अपने हस्तनिर्मित उत्पाद, तकनीक और कलात्मक परंपराओं को प्रदर्शित कर रहे हैं। यहां हथकरघा, सजावटी वस्तुएं, पारंपरिक कपड़े और कई प्रकार की कलाकृतियां लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं।
दिल्ली में वैश्विक शिल्प की झलक
यह बाजार विभिन्न देशों की सांस्कृतिक पहचान को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है। यहां पारंपरिक वस्त्रों से लेकर सजावटी कला और स्थानीय विरासत से जुड़े हस्तनिर्मित उत्पादों का प्रदर्शन किया गया है। 18 देशों के कारीगर, डिजाइनर और रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े उद्यमी एक ही स्थान पर अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे आगंतुक ब्रिक्स देशों की समानताओं और सांस्कृतिक विविधता को करीब से देख सकते हैं।
भारतीय शिल्प परंपरा की विशेषता
ब्रिक्स बाजार में भारत की प्राचीन हस्तशिल्प और हथकरघा परंपरा को भी प्रमुखता दी गई है। राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय और हस्तकला अकादमी भारतीय शिल्प विरासत को संरक्षित करने और इसे लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रसिद्ध है। इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन के लिए यह स्थान विशेष महत्व रखता है, जिससे भारतीय कारीगरों और शिल्प परंपराओं के माध्यम से देश की सांस्कृतिक पहचान वैश्विक स्तर पर उजागर हो रही है।
ब्रिक्स बाजार का व्यापक दायरा
ब्रिक्स बाजार का दायरा केवल वस्त्रों तक सीमित नहीं है। यह कारीगरों को पहचान दिलाने और विभिन्न देशों के बीच सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने का एक मंच भी है। यहां प्रदर्शित वस्तुओं के माध्यम से लोग पारंपरिक तकनीकों, डिजाइनों और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत को समझ सकते हैं। इस प्रकार की पहल हस्तनिर्मित उत्पादों के प्रति रुचि बढ़ाने और पारंपरिक शिल्प कौशल को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकती है।
