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भगवान जगन्नाथ की अद्भुत यात्रा: 144 वर्षों का रहस्य

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का इतिहास अद्भुत और रहस्यमय है। यह कहानी बताती है कि कैसे भगवान को 144 वर्षों तक पुरी से दूर रखा गया था। हमलावरों से उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें पाताली श्रीक्षेत्र में छिपाया गया था। जानें इस ऐतिहासिक घटना के बारे में और कैसे स्थानीय शासकों और पुजारियों ने इस रहस्य को सुरक्षित रखा।
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पुरी मंदिर का अनकहा इतिहास


जानें पुरी मंदिर का अनसुना इतिहास


Jagannath Rath Yatra, पुरी: उड़ीसा के पुरी में भगवान जगन्नाथ के मंदिर का एक दिलचस्प इतिहास है। कहा जाता है कि एक समय ऐसा आया जब भगवान जगन्नाथ को लगभग 144 वर्षों तक पुरी से दूर रहना पड़ा। यह तब हुआ जब मंदिर के सेवकों ने हमलावरों से उनकी पवित्र मूर्तियों को बचाने के लिए उन्हें चुपचाप पाताली श्रीक्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया।


भगवान जगन्नाथ 144 साल तक क्यों गायब रहे?

भगवान जगन्नाथ को हमलावरों से बचाने के लिए मंदिर के पुजारियों ने उन्हें पुरी से हटाकर आज के सुबरनपुर में त्रिकूट पहाड़ियों के पास पाताली श्रीक्षेत्र में छिपा दिया। यह स्थान प्रभु जगन्नाथ के लिए सुरक्षित रहने का एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया।


पाताली का अर्थ है छिपा हुआ या जमीन के नीचे, जो इस स्थान की पवित्रता को दर्शाता है। देवता लगभग 144 वर्षों तक वहीं रहे, और स्थानीय शासकों, पुजारियों और ग्रामीणों ने इस रहस्य को सुरक्षित रखा।


मदाला पंजी और स्थानीय परंपराओं में आज भी सुरक्षित है कहानी

कहा जाता है कि जब हमलावरों का खतरा समाप्त हुआ, तो राजा ययाति केशरी ने भगवान को फिर से मंदिर में लाने का निर्णय लिया। इसके बाद भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पुनः प्रारंभ हुई, जिससे मंदिर के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया। यह कहानी मदाला पंजी और स्थानीय परंपराओं में आज भी जीवित है।


रक्तबाहु के आक्रमण से गांव वालों ने प्रभु को बचाया

इतिहासकारों का मानना है कि लगभग 1000 साल पहले भगवान जगन्नाथ को गोपाली गांव के त्रिकुटा पहाड़ियों में दो बार भूमिगत रखा गया था। आछवीं शताब्दी में रक्तबाहु के आक्रमण के समय, भगवान को गांव में लाया गया और 45 वर्षों तक छिपाकर रखा गया। इस दावे की पुष्टि विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों में की गई है।