Newzfatafatlogo

भाजपा के लिए युवा पीढ़ी का विश्वास जीतना चुनौतीपूर्ण

भाजपा के लिए युवा पीढ़ी का विश्वास जीतना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। जंतर मंतर पर हुए आंदोलन ने इस पीढ़ी की सोच को प्रभावित किया है। प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों के बावजूद, युवाओं का भाजपा पर विश्वास नहीं बन पा रहा है। इस लेख में जानिए कैसे 'जेन जी' और 'जेन अल्फा' की जागरूकता और उनके अभिभावकों की भूमिका आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
 | 

युवाओं का आंदोलन और भाजपा का प्रयास


यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या वह पीढ़ी, जिसने पेपर लीक के खिलाफ और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के लिए जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया, कभी भाजपा पर भरोसा करेगी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पीढ़ी का विश्वास जीतने के लिए कई प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने इंस्टाग्राम पर तीन वीडियो साझा किए, जिसमें उन्होंने युवाओं को 'फ्रेंड्स' कहकर संबोधित किया और उनके साथ जुड़ने की कोशिश की। उनकी पार्टी के सांसदों ने पेपर लीक के खिलाफ लाए गए बिल पर चर्चा के दौरान 'जेन जी' की भाषा का उपयोग किया। यह दर्शाने का प्रयास किया गया कि भाजपा उनकी असली प्रतिनिधि पार्टी है। फिर भी, सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री की वीडियो क्लिप्स का मजाक उड़ाया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस पीढ़ी का भाजपा पर विश्वास नहीं बनेगा।


युवाओं की संख्या और उनका राजनीतिक प्रभाव

इस पीढ़ी की संख्या काफी बड़ी है। जब ये सभी युवा वोट देने के योग्य होंगे, तब भाजपा को एक वास्तविक चुनौती का सामना करना पड़ेगा। अनुमान के अनुसार, 'जेन जी' यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी की संख्या 35 से 38 करोड़ के बीच है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 27 प्रतिशत है। इनकी उम्र 14 से 29 वर्ष के बीच है। यदि हम किशोरों को छोड़ दें, जो अगले चुनाव तक वोट देने के योग्य नहीं होंगे, तब भी यह संख्या 25 करोड़ से अधिक होगी।


आंदोलन का उद्देश्य और प्रतिक्रिया

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उनका आंदोलन किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं था, बल्कि यह उनके अस्तित्व की रक्षा के लिए था। पेपर लीक ने उनकी पढ़ाई और परीक्षाओं को प्रभावित किया। इसके परिणामस्वरूप, पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और उन्हें रोकने के लिए मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए। अब उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है और धमकियां मिल रही हैं।


नई पीढ़ियों का जागरूकता

यह केवल 'जेन जी' की बात नहीं है, बल्कि इससे पहले और बाद की पीढ़ियों की भी बात है। 'जेन अल्फा', जो 2012 के बाद जन्मी है, में भी जागरूकता बढ़ी है। मध्य प्रदेश के शहडोल में छात्राओं ने बिजली और पानी की समस्याओं के खिलाफ प्रदर्शन किया। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में भी छात्रों ने बुनियादी सुविधाओं की कमी के खिलाफ आवाज उठाई।


भविष्य की राजनीतिक चुनौतियाँ

इन दोनों पीढ़ियों के अभिभावकों की संख्या भी 40 करोड़ के आसपास है। यह पीढ़ी, जो 1980 से 1996 के बीच जन्मी है, अपने बच्चों की समस्याओं को समझेगी। यदि उनकी राजनीतिक विचारधारा उनके बच्चों की आवश्यकताओं से प्रभावित होती है, तो इसका देश की राजनीति पर बड़ा असर पड़ेगा। इन तीन पीढ़ियों का कुल जनसंख्या लगभग 120 करोड़ है, जिसमें से अगले चुनाव में लगभग 70 करोड़ मतदाता होंगे।


सरकार और युवा पीढ़ी के बीच संवाद

जैसे पिछली पीढ़ियों की यादों में कई घटनाएं शामिल हैं, जो उनके विचारों को प्रभावित करती हैं, वैसे ही इस पीढ़ी के विचार भी डिजिटल युग में बन रहे हैं। जंतर मंतर का आंदोलन उनकी स्मृति में स्थायी रहेगा। सरकार का व्यवहार भी लंबे समय तक याद रखा जाएगा। इसलिए, भाजपा और संघ परिवार के साथ इस पीढ़ी को जोड़ना आगामी चुनावों में चुनौतीपूर्ण होगा।