भारत का साउथ चाइना सी पर स्पष्ट रुख, UNCLOS के तहत समुद्री अधिकारों का समर्थन
भारत का स्पष्ट रुख
भारत ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि साउथ चाइना सी से संबंधित उसके विचार सभी के लिए ज्ञात हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि UNCLOS के तहत समुद्र में आवाजाही और उड़ान भरने की स्वतंत्रता का महत्व है। उन्होंने बताया कि दस साल पहले आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का निर्णय एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का आधार बनता है।
समुद्री विवादों का समाधान
जायसवाल ने कहा कि समुद्री विवादों का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से और UNCLOS के अनुसार होना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि 12 जुलाई को 2016 के अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता फैसले की दसवीं वर्षगांठ थी। इस फैसले ने दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों को अमान्य कर दिया था।
अंतरराष्ट्रीय समर्थन
अमेरिका और जापान सहित 14 देशों के एक समूह ने 11 जुलाई को इस फैसले की पुष्टि की, जिसमें कहा गया कि चीन के दावे का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह संयुक्त बयान जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, एस्टोनिया, जर्मनी, इटली, लातविया, लिथुआनिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, रोमानिया, स्लोवेनिया, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका द्वारा जारी किया गया।
यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया
यूरोपीय संघ ने भी 2016 के मध्यस्थता निर्णय को लागू करने का आह्वान किया है। यूरोपीय संघ के उच्च प्रतिनिधि ने कहा कि यह निर्णय फिलीपींस और चीन के लिए 'अंतिम और कानूनी रूप से बाध्यकारी' है। हालांकि, चीन ने इस निर्णय को लगातार खारिज किया है।
ऐतिहासिक निर्णय
12 जुलाई, 2016 को हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने फिलीपींस द्वारा दायर मामले में सर्वसम्मति से निर्णय सुनाया। यह निर्णय ऐतिहासिक था, क्योंकि यह पहली बार था जब किसी अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर में समुद्री दावों की कानूनी वैधता पर फैसला सुनाया।
