भारत की प्रतिक्रिया: अमेरिका के हमले पर गहरा आक्रोश
पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव
पश्चिम एशिया आज एक ऐसे ज्वालामुखी की तरह है जो फट चुका है। चारों ओर बारूद की गंध फैली हुई है। आसमान से बम गिर रहे हैं और समुद्र की लहरें अब लाल हो रही हैं। जब इस युद्ध की आग में निर्दोष भारतीयों की जान जाती है, तो दिल्ली का सिंहासन हिल जाता है। होर्मुज के समुद्र में अमेरिका ने एक कायराना कदम उठाया, जिसने भारत के धैर्य को तोड़ दिया। तीन भारतीय नाविकों की जान चली गई, और इसके पीछे महाशक्ति होने का अहंकार था। यह दिन इतिहास में अमेरिका की उस सशस्त्र डकैती के रूप में दर्ज होगा, जिसने तीन भारतीय परिवारों को जीवनभर का दर्द दिया। लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अमेरिका ने सोचा कि वह झूठ बोलेगा और भारत मान लेगा।
भारत की कड़ी प्रतिक्रिया
ट्रंप ने ईरान पर आरोप लगाया, लेकिन भारत ने उसी उंगली को मोड़कर अमेरिका को आईना दिखा दिया। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आधी रात को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को फोन किया, जिससे वाशिंगटन में सन्नाटा छा गया। ओमान की खाड़ी में तेल टैंकर एम्प्टी सिट्टे बेलो शांति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा था। इस जहाज पर कोई लड़ाकू विमान या मिसाइलें नहीं थीं, बल्कि 24 भारतीय नागरिक थे, जो समुद्र में मेहनत कर रहे थे। अचानक, अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों ने इस कमर्शियल जहाज को घेर लिया और बिना किसी चेतावनी के हमला कर दिया। गोलियों की बौछार में जहाज हिल गया और हमारे 21 भारतीय भाइयों ने मौत का सामना किया, लेकिन तीन भारतीयों की जान चली गई।
अमेरिका की चालाकी का पर्दाफाश
डेक कैडेड आदित्य शर्मा, इंजन फिटर शिवंद चौरसिया और चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश, ये केवल नाम नहीं हैं, बल्कि भारत के वे बेटे हैं जिनकी जान अमेरिका की गलतफहमी और अहंकार ने ले ली। जैसे ही भारत में इन तीनों की मौत की खबर पहुंची, देश का गुस्सा आसमान छू गया। अमेरिका ने खुद हमला किया, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि यह हमला ईरान के ड्रोन ने किया। ट्रंप ने कोशिश की कि भारत को बरगला लिया जाए और इस पूरे मामले का ठीकरा ईरान पर फोड़ दिया जाए। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप शायद भूल गए कि सामने मोदी का भारत है। भारत ने उनकी बातों पर भरोसा करने के बजाय अपनी खुद की उच्च स्तरीय जांच शुरू की।
सच्चाई का खुलासा
भारत ने सेटेलाइट डेटा की जांच की और बचे हुए नाविकों के बयान लिए। सच सामने आया कि हमला किसी ईरानी ड्रोन ने नहीं, बल्कि अमेरिकी नौसेना के जहाज से हुआ था। अमेरिका की चालाकी का पर्दाफाश हो गया और अब भारत का स्टैंड स्पष्ट था। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तब भारत के चाणक्य एस जयशंकर ने अमेरिकी राजदूत को दिल्ली में तलब किया और सीधे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को फोन किया। यह बातचीत किसी कूटनीतिक मुलाकात जैसी नहीं थी; जयशंकर ने रूबियो को बुरी तरह फटकारा।
