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भारत की राजनीति: असली और दिखावे की राजनीति का संतुलन

इस लेख में भारत की राजनीति के दो पहलुओं, असली और दिखावे की राजनीति, पर चर्चा की गई है। यह बताया गया है कि कैसे चुनावी सफलता के लिए इन दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है। विशेष रूप से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के नेताओं द्वारा इस संतुलन को बनाए रखने के प्रयासों का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा, विपक्ष की चुनौतियों और सिविल सोसायटी की भूमिका पर भी विचार किया गया है। क्या दिखावे की राजनीति वास्तव में प्रभावी है? जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
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राजनीति का दोहरा चेहरा


भारत में राजनीति के दो रूप होते हैं: असली और दिखावे वाली, जिसे परफॉर्मेटिव पॉलिटिक्स कहा जाता है। चुनावी सफलता के लिए इन दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है। जब टेलीविजन मीडिया का प्रसार हुआ, तो नेताओं में स्क्रीन पर दिखने की होड़ मच गई, जिससे परफॉर्मेटिव पॉलिटिक्स का अनुपात बढ़ा। लालू प्रसाद जैसे नेताओं ने इस माध्यम का लाभ उठाया, लेकिन संतुलन बनाए रखा। हाल के वर्षों में सोशल मीडिया के तेजी से बढ़ने से नेताओं को दिखावे की राजनीति करने के और अवसर मिले हैं।


हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के नेता, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह, असली और दिखावे की राजनीति का संतुलन बनाए रखते हैं। मोदी ने मीडिया का कुशलता से उपयोग किया है। समस्या विपक्षी दलों की है, जो दिखावे की राजनीति को असली मानने लगे हैं। उन्हें लगता है कि सोशल मीडिया पर उनके मुद्दों को अधिक ट्रैक्शन मिल रहा है, जिससे वे चुनाव जीत जाएंगे।


सोशल मीडिया पर इन्फ्लूएंसर्स के व्यूज के आंकड़े बताते हैं कि टॉप 20 में चार या पांच राइटविंग इन्फ्लूएंसर्स होते हैं, जबकि बाकी सरकार और भाजपा के विरोधी होते हैं। इस आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है कि हवा बदल गई है। लेकिन जब भाजपा चुनाव जीतती है, तो इसे चुनाव आयोग की वजह से बताया जाता है।


यह संभव नहीं है कि जनभावना के खिलाफ चुनाव आयोग किसी पार्टी को जीत दिला दे। पहले भी जब बैलेट से वोटिंग होती थी, तब बूथ कैप्चरिंग होती थी, लेकिन केवल बूथ कैप्चरिंग के आधार पर कोई चुनाव नहीं जीत सकता था। इसलिए यह कहना कि भाजपा चुनाव आयोग के कारण जीत रही है, नादानी है।


भाजपा की जीत के ठोस आधार हैं, जबकि कांग्रेस और विपक्ष की जीत के दावे आभासी हैं। हाल ही में, जब 'इंडियन एक्सप्रेस' ने मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानियों का खुलासा किया, तो सीपीआई माले ने प्रदर्शन का ऐलान किया। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण भी इसमें शामिल हुए। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस परफॉर्मेटिव पॉलिटिक्स से कांग्रेस को कोई लाभ होगा?


योगेंद्र यादव पहले समाजवादी जन परिषद के नेता थे, फिर चुनाव विश्लेषक बने और आम आदमी पार्टी में शामिल हुए। पिछले 12 वर्षों में उन्होंने भाजपा के हारने और कांग्रेस के जीतने की भविष्यवाणी की है, लेकिन अब उनकी भविष्यवाणियों पर कोई ध्यान नहीं देता। राहुल गांधी ने योगेंद्र यादव पर भरोसा किया, लेकिन क्या यह भरोसा सही है?


राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा ने उनकी गंभीरता को स्थापित किया और कर्नाटक में कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाई। लेकिन सिविल सोसायटी के चेहरे अपने एजेंडे पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वे कांग्रेस के राजनीतिक अभियान को सप्लीमेंट करने के बजाय खुद को प्रमुखता दे रहे हैं।


सिविल सोसायटी ने पहले आम जनता के गुस्से को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को यह समझना चाहिए कि केवल दिखावे की राजनीति से कुछ नहीं होगा।


कांग्रेस को एक मजबूत संगठन और प्रभावशाली नैरेटिव की आवश्यकता है। नरेंद्र मोदी के पास नेतृत्व और संगठन है, लेकिन नैरेटिव कमजोर हुआ है। सिविल सोसायटी की विश्वसनीयता को बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि विपक्ष और राहुल गांधी के प्रति पूर्वाग्रहों को मिटाया जा सके।